चाद्विकारे। मयूरस्यावयवो विकारो वा मायूरः।
मौर्वं काण्डं भस्म वा। पैप्पलम्।
११११- अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः। प्राणिनश्च ओषधयश्च वृक्षाश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः प्राण्योषधिवृक्षास्तेभ्यः। अवयवे सप्तम्यन्तं, चाव्ययपदं, प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्य विकारः की अनुवृत्ति आती है और ऊपर से तद्धिताः, ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है। इस सूत्र में अवयव अर्थ और जुड़ जाता है।
प्राणी, औषधी और वृक्ष वाचक शब्दों से विकार और अवयव अर्थ में अण् आदि प्रत्यय होते हैं।
मायूरः। मयूर के अवयव टांग, सिर आदि अथवा मयूर का विकार। मयूरस्य विकारः, अवयवो वा लौकिक विग्रह और मयूर डस् अलौकिक विग्रह है। अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः से अण् प्रत्यय हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, मयूर+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि होने पर अकार के स्थान पर आकार होकर भसंज्ञक अकार का लोप हुआ, मायूर+अ=मायूर बना। स्वादिकार्य करके मायूरः सिद्ध हुआ। यह प्राणिवाचक का उदाहरण है।
मौर्वम्। मूर्वा नामक औषधी विशेष, लता का अवयव काण्ड, मूल आदि अथवा विकार भस्म आदि। मूर्वायाः विकारः लौकिक विग्रह और मूर्वा डस् अलौकिक विग्रह है। तस्य विकारः से अण् प्रत्यय हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, मूर्वा+अ बना। णित् होने
के कारण आदिवृद्धि होने पर ऊकार के स्थान पर औकार होकर भसंज्ञक आकार का लोप हुआ, मौर्व्+अ=मौर्व बना। स्वादिकार्य करके मौर्वम् सिद्ध हुआ। यह औषधि का वाचक है।
पैप्पलम्। पीपल नामक वृक्ष का अवयव डाली, पत्ते अथवा पीपल का भस्म आदि। पिप्पलस्य विकारः, अवयवो वा लौकिक विग्रह और पिप्पल डस् अलौकिक विग्रह है। अवयवे च प्राणयोषधिवृक्षेभ्यः से अण् प्रत्यय हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, पिप्पल+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि, भसंज्ञक आकार का लोप हुआ, पैप्पल्+अ=पैप्पल बना। स्वादिकार्य करके पैप्पलम् सिद्ध हुआ। यह वृक्षवाचक का उदाहरण है।