सुघ्नमभिनिष्क्रामति स्रौघ्नं कान्यकुब्जद्वारम्।
११०५- अभिनिष्क्रामति द्वारम्। अभिनिष्क्रामति क्रियापदं, द्वारं प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तद् गच्छति पथिदूतयोः से तत् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
द्वितीयान्त समर्थ प्रातिपदिकों से 'अभिनिष्क्रामति' अर्थात् उस ओर निकलता है इस अर्थ में अण् आदि प्रत्यय होते हैं किन्तु निकलने वाला यदि द्वार हो तो।
स्रौघ्नः। सुघ्न नामक देश की ओर निकलने वाला कान्यकुब्ज देश का द्वार। सुघ्नम् अभिनिष्क्रामति कान्यकुब्जद्वारम्। सुघ्न अम् अलौकिक विग्रह है। अभिनिष्क्रामति द्वारम् से अण् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सुघ्न+अ बना है। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके स्रौघ्न+अ=स्रौघ्न बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके स्रौघ्नः सिद्ध हुआ।