समादागतं समरूप्यम्। पक्षे- गहादित्वाच्छः। समीयम्। विषमीयम्।
देवदत्तरूप्यम्। दैवदत्तम्।
११०१- हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्यः। हेतवश्च मनुष्याश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो हेतुमनुष्याः, तेभ्यः। हेतुमनुष्येभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तं, रूप्यः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। ततः आगतः इस सूत्र का अनुवर्तन एवं प्रत्ययः, परश्च, उच्चाप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
हेतुवाचक एवं मनुष्यवाचक पञ्चम्यन्त प्रातिपदिकों से 'तत आगतः' के अर्थ में विकल्प से रूप्य प्रत्यय होता है।
समरूप्यम्। सम अर्थात् उचित हेतु से आया हुआ सामान। समादागतम्। सम ङसि से हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्यः से विकल्प से रूप्य प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्वादिकार्य करने पर समरूप्यम् बना। यह कार्य वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में गहादिभ्यश्च से छ प्रत्यय, उसके स्थान पर ईय आदेश होकर भसंज्ञक अकार के लोप के बाद वर्णसम्मेलन, स्वादिकार्य करके समीयम् बन जाता है। इसी तरह विषमादागतं इस विग्रह में विषम ङसि से विषमरूप्यम्, विषमीयम् भी बनाइये।
देवदत्तरूप्यम्, दैवदत्तम्। देवदत्त से आया हुआ सामान। यह मनुष्यवाचक का उदाहरण है। देवदत्तादागतम् लौकिक विग्रह और देवदत्त ङसि अलौकिक विग्रह में हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्यः से विकल्प से रूप्य प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्वादिकार्य करने पर देवदत्तरूप्यम् बना। यह कार्य वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में तत आगतः से अण् होकर भसंज्ञक अकार के लोप के बाद वर्णसम्मेलन, स्वादिकार्य करके दैवदत्तम् भी बन जाता है।