Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1100
वुञ्-विधायकं विधिसूत्रम्
विद्यायोनिसंबन्धेभ्यो वुञ्
Aṣṭādhyāyī 4.3.77
Vṛtti Varadarājācārya

औपाध्यायकः। पैतामहकः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११००- विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुञ्। विद्या च योनिश्च विद्यायोनी, विद्यायोनिकृताः सम्बन्धाः विद्यायोनिसम्बन्धाः, तेभ्यः। विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यः पञ्चम्यन्तं, वुञ् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। ततः आगतः इस सूत्र का अनुवर्तन और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

विद्याकृत सम्बन्ध वाले या योनिकृतसम्बन्ध वाले पञ्चम्यन्त प्रातिपदिकों से 'तत आगतः' अर्थ में वुञ् प्रत्यय होता है।

विद्यासम्बन्ध शिक्षा-ग्रहण से और योनिसम्बन्ध जन्म से होता है। जकार इत्संज्ञक है और वु के स्थान पर युवोरनाकौ से अक आदेश होता है। उपाध्याय, आचार्य, शिष्य आदि विद्यासम्बन्ध के हैं और पिता, पितामह, माता, मातामह, मातुल आदि योनिसम्बन्ध के हैं।

औपाध्यायकः। उपाध्याय से आया हुआ विचार, मत, सलाह आदि। उपाध्यायाद् आगतः लौकिक विग्रह और उपाध्याय डसि अलौकिक विग्रह है। विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुञ् से वुञ् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके उपाध्याय+वु बना है। वु के स्थान पर युवोरनाकौ से अक आदेश करने पर उपाध्याय+अक बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक आकार का लोप करके औपाध्याय+अक=औपाध्यायक बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके औपाध्यायकः सिद्ध हुआ।

पैतामहकः। पितामह अर्थात् दादा से आया हुआ। पितामहाद् आगतः लौकिक

विग्रह और पितामह ङसि अलौकिक विग्रह है। विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुञ् से वुञ् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् कर पितामह+वु बना है। वु के स्थान पर युवोरनाकौ से अक आदेश करने पर पितामह+अक बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके इकार के स्थान पर एकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके पैतामह+अक=पैतामहक बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके पैतामहकः सिद्ध हुआ। अब इसी प्रकार से आचार्यादागतः-आचार्यकः, शिष्यादागतः-शैष्यकः, मातुलादागतः-मातुलकः आदि बनाये जा सकते हैं।