दिश्यम्। वर्ग्यम्।
१०९३- दिगादिभ्यो यत्। दिक् आदिर्येषां ते दिगादयस्तेभ्यः। दिगादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
सप्तम्यन्त समर्थ दिक् आदि प्रातिपदिकों से 'वहाँ होता है या वहाँ होने वाला' इस शैक्षिक अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।
तकार इत्संज्ञक है, य बचता है।
दिश्यम्। दिशा में होने वाला पदार्थ। दिशि भवम् लौकिक विग्रह और दिश् डि अलौकिक विग्रह है। दिगादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर दिश्+य बना है। वर्णसम्मेलन, सु, अम् आदेश करके दिश्यम् सिद्ध हुआ।
वर्ग्यम्। वर्ग में होने वाला पदार्थ। वर्गे भवम् लौकिक विग्रह और वर्ग डि अलौकिक विग्रह है। दिगादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर वर्ग+य बना है। यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन, सु, अम् आदेश करने पर वर्ग्यम् सिद्ध हुआ। इसी तरह आदौ भवः आद्यः, अन्ते भवः अन्त्यः, रहसि भवं रहस्यम् आदि भी दिगादि मान कर के बना सकते हैं। १०९४- शरीरावयवाच्च। शरीरस्य अवयवः शरीरावयवः, षष्ठीतत्पुरुषः। तस्मात्। शरीरावयवात् पञ्चम्यन्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तत्र भवः यह सूत्र अनुवृत्त होता है और दिगादिभ्यो यत् से यत् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।