Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1094
यत्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
शरीरावयवाच्च
Aṣṭādhyāyī 4.3.55
Vṛtti Varadarājācārya

दन्त्यम्। कण्ठ्यम्।

वार्तिकम्- अध्यात्मादेष्ठञ् इष्यते। अध्यात्मं भवम् आध्यात्मिकम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

शरीर के अवयव वाचक सप्तम्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से 'होने वाला' इस अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

तकार इत्संज्ञक है, य बचता है।

दन्त्यम्। दन्त में होने वाला पदार्थ, मल आदि कुछ भी। दन्तेषु भवम् लौकिक विग्रह और दन्त सुप् अलौकिक विग्रह हैं। शरीरावयवाच्च से यत् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् कर दन्त+य बना है। भसंज्ञक अकार का लोप करके दन्त+य=दन्त्य बना, सु के बाद अम् आदेश और पूर्वरूप करके दन्त्यम् सिद्ध हुआ।

कण्ठ्यम्। कण्ठ में होने वाला पदार्थ, मल आदि कुछ भी। कण्ठे भवम् लौकिक विग्रह और कण्ठ डि अलौकिक विग्रह हैं। शरीरावयवाच्च से यत् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर कण्ठ+य बना है। भसंज्ञक अकार का लोप करके कण्ठ्य+य=कण्ठ्य बना, सु के बाद अम् आदेश और पूर्वरूप करके कण्ठ्यम् सिद्ध हुआ।

इसी तरह शरीर के अवयववाची अन्य शब्दों से भी यत् करके निम्नानुसार रूप सिद्ध कीजिए-

कर्णे भवम्-कर्ण्यम्=कान में होने वाला।

ओष्ठे भवम्-ओष्ठ्यम्= होंठ में होने वाला।

उरसि भवम्-उरस्यम्=छाती में होने वाला।

मुखे भवम्-मुख्यम्=मुख में होने वाला।

तालुनि भवम्-तालव्यम्=तालु में होने वाला।

मूर्धनि भवम्-मूर्धन्यम्=मूर्धा में होने वाला।

अध्यात्मादेष्ठजिष्यते। यह वार्तिक है। 'तत्र भवः' अर्थ में ही अध्यात्म आदि शब्दों से ठज् होता है। जकार इत्संज्ञक है। ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश हो जाता है।

आध्यात्मिकम्। आत्मनि इति अध्यात्मम्=आत्मा(के विषय) में, भवम्=होने वाला। अध्यात्म शब्द अव्ययीभाव समास में निष्पन्न होने के कारण अव्यय है। उसके परे रहते विभक्ति की स्थिति नहीं है। अतः विभक्ति रहित अध्यात्म से अध्यात्मादेष्ठजिष्यते से ठज् हुआ, अनुबन्धलोप, अध्यात्म+ठ प्रातिपदिकसंज्ञा, ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश करके अध्यात्म+इक बना। आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके आध्यात्म+इक=आध्यात्मिक बना। सु, अम्, पूर्वरूप, आध्यात्मिकम् सिद्ध हुआ।

अध्यात्मादि को आकृतिगण मानकर अनेक तादृश(उसी प्रकार के) शब्दों से भी तत्र भवः अर्थ में ठज् करके निम्नलिखित प्रयोगों की सिद्धि की जा सकती है-

इह भवम्=ऐहिकम् (यहाँ अथवा इस लोक में होने वाला)

अमुत्र भवम्=आमुत्रिकम् (वहाँ अर्थात् उस लोक में होने वाला)

त्रिवर्णेषु भवः=त्रैवर्णिकः (तीनों वर्णों का धर्म आदि)

स्वभावे भवः=स्वाभाविको (स्वाभाविक गुण आदि)