सुघ्ने भवः स्रौघ्नः। औत्सः। राष्ट्रियः।
१०९२- तत्र भवः। तत्र इति सप्तम्यन्तस्यानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, भवः प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
सप्तम्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से 'वहाँ होता है या वहाँ होने वाला' इस अर्थ में शैक्षिक अर्थ में होने वाले अण् आदि प्रत्यय और घ आदि प्रत्यय यथासम्भव होते हैं।
यह सूत्र भी यह निर्णय नहीं करता कि कौन सा प्रत्यय हो किन्तु यह निर्णय करता है कि वहाँ होता है इस अर्थ में प्रत्यय हों। अतः जहाँ जिसकी प्राप्ति न्याय्य होगी, वहाँ वही प्रत्यय होगा।
स्रौघ्नः। स्रुघ्न नामक देश में होने वाला पदार्थ। स्रुघ्ने भवः लौकिक विग्रह और स्रुघ्न डि अलौकिक विग्रह है। तत्र भवः से अण् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर स्रुघ्न+अ बना है। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके स्रौघ्न+अ=स्रौघ्न बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके स्रौघ्नः सिद्ध हुआ। इसी तरह औत्सः, राष्ट्रियः, पारावारीणः आदि भी बनाइये।