Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1091
ढञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कोशाड्ढञ्
Aṣṭādhyāyī 4.3.42
Vṛtti Varadarājācārya

कौशेयं वस्त्रम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०९१- कोशाड्ढञ्। कोशात् पञ्चम्यन्तं, ढञ् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तत्र जातः से तत्र और सम्भूते से सम्भूते की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

सप्तम्यन्त समर्थ प्रातिपदिक कोश-शब्द से 'होने की सम्भावना है' इस अर्थ में शैक्षिक ढञ् प्रत्यय होता है।

जकार इत्संज्ञक है, ढ बचता है। उसमें केवल ढ के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से एय् आदेश होकर एय बन जाता है। यह सम्भूते से प्राप्त अण् का बाधक है।

स्रौघ्नः। रेशम धागे में होने वाला वस्त्र। कोशे सम्भूतम् लौकिक विग्रह और कोश डि अलौकिक विग्रह है। सम्भूते से अण् प्राप्त था, उसे बाधकर कोशाड् ढञ् से ढञ् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर कोश+ढ बना। ढकार के स्थान पर एय् आदेश होकर कोश+एय बना। जित् होने के कारण आदिवृद्धि करके ओकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके कौश्+एय=कौशेय बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके कौशेयः सिद्ध हुआ।