Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1090
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
संभूते
Aṣṭādhyāyī 4.3.41
Vṛtti Varadarājācārya

सुघ्ने सम्भवति स्रौघ्नः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०९०- सम्भूते। सम्भूते सप्तम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। तत्र जातः से तत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

सप्तम्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से 'होने की सम्भावना है' इस अर्थ में शैषिक अर्थ में होने वाले अण् आदि प्रत्यय और घ आदि प्रत्यय यथासम्भव होते हैं।

यह सूत्र भी यह निर्णय नहीं करता कि कौन सा प्रत्यय हो किन्तु यह निर्णय करता है कि 'सम्भव होता है' इस अर्थ में प्रत्यय हो। अतः जहाँ जिसकी प्राप्ति न्याय्य होगी वहाँ वही प्रत्यय होगा।

स्रौघ्नः। सुघ्न नामक देश में सम्भव होने वाला पदार्थ। सुघ्ने सम्भूतः लौकिक विग्रह और सुघ्न डि अलौकिक विग्रह है। सम्भूते से अण् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर सुघ्न+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके स्रौघ्न+अ=स्रौघ्न बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके स्रौघ्नः सिद्ध हुआ। इसी तरह औत्सः, राष्ट्रियः, पारावारीणः भी बनाइये।