सप्तमीसमर्थाज्जात इत्यर्थेऽणादयो घादयश्च स्युः।
स्रुघ्ने जातः स्रौघ्नः। उत्से जातः औत्सः। राष्ट्रे जातो राष्ट्रियः।
अवारपारे जात अवारपारीण इत्यादि।
.....
११८७- तत्र जातः। तत्र इति सप्तम्यन्तस्यानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, जातः प्रथमान्तं द्विपदमिदं
सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा
और शेषे का अधिकार है।
सप्तम्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से उसमें 'उत्पन्न हुआ' इस अर्थ में शैक्षिक
अर्थ में होने वाले अण् आदि प्रत्यय और घ आदि प्रत्यय यथासम्भव होते हैं।
यह सूत्र यह निर्णय नहीं करता कि कौन सा प्रत्यय हो किन्तु यह निर्णय करता
है कि उसमें उत्पन्न हुआ इस अर्थ में प्रत्यय हो। अतः जहाँ जिसकी प्राप्ति न्याय्य होगी
वहाँ पर वही प्रत्यय होगा।
स्रौघ्नः। स्रुघ्न नामक देश में उत्पन्न हुआ पदार्थ। स्रुघ्ने जातः लौकिक विग्रह और
स्रुघ्न डि अलौकिक विग्रह है। तत्र जातः से अण् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप्
का लुक् कर स्रुघ्न+अ बना है। णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर
औकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करके स्रौघ्न+अ=स्रौघ्न बना, सु के बाद
रुत्वविसर्ग करके स्रौघ्नः सिद्ध हुआ।
औत्सः। उत्स अर्थात् झरने में उत्पन्न हुआ पदार्थ, मेढक आदि। उत्से जातः
लौकिक विग्रह और उत्स डि अलौकिक विग्रह है। तत्र जातः के अर्थ में उत्सादिभ्योऽञ्
से अञ् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर उत्स+अ बना है। ञित्
होने के कारण आदिवृद्धि करके उकार के स्थान पर औकार आदेश और भसंज्ञक अकार
का लोप करके औत्स्+अ=औत्स बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके औत्सः सिद्ध हुआ।
राष्ट्रियः। राष्ट्र में उत्पन्न हुआ पदार्थ। राष्ट्रे जातः लौकिक विग्रह और राष्ट्र डि
अलौकिक विग्रह है। तत्र जातः से घ हुआ क्योंकि पहले भी राष्ट्रावारपाराद् घखौ के द्वारा
राष्ट्र शब्द से घ प्रत्यय ही हुआ है अर्थात् यहाँ भी यही न्याय्य है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का
लुक् कर राष्ट्र+घ बना है। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से घ के घकार के
स्थान पर इय् आदेश करके इय, राष्ट्र+इय बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके
राष्ट्र्+इय=राष्ट्रिय बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके राष्ट्रियः सिद्ध हुआ।
अवारपारीणः। इस पार और उस पार उत्पन्न हुआ पदार्थ। अवारपारे जातः
लौकिक विग्रह और अवारपार डि अलौकिक विग्रह है। तत्र जातः से ख हुआ क्योंकि
पहले भी राष्ट्रावारपाराद् घखौ के द्वारा अवारपार शब्द से ख प्रत्यय ही हुआ है अर्थात्
यहाँ भी यही न्याय्य है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर अवारपार+ख बना।
आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ख के खकार के स्थान पर ईन् आदेश
करके ईन, अवारपार+ईन बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके अवारपार्+ईन=अवारपारिन
बना, णत्व करके सु और सु के बाद रुत्वविसर्ग करके अवारपारीणः सिद्ध हुआ। इब इसी
प्रकार पारावारीणः, अवारीणः, पारीणः आदि भी बनाइये।