Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1086
निपातनार्थं विधिसूत्रम्
सायंचिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च
Aṣṭādhyāyī 4.3.23
Vṛtti Varadarājācārya

सायमित्यादिभ्यश्चतुभ्योऽव्ययेभ्यश्च कालवाचिभ्यष्ट्युट्युलौ

स्तस्तयोस्तुट् च। सायन्तनम्। चिरन्तनम्। प्राह्ले प्रगे अनयोरेदन्तत्वं

निपात्यते। प्राह्लेतनम्। प्रगेतनम्। दोषातनम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०८६- सायञ्चिरम्प्राह्लेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च। सायञ्च चिरञ्च प्राह्ले च प्रगे च अव्ययञ्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः सायञ्चिरम्प्राह्लेप्रगेऽव्ययानि, तेभ्यः। ट्युश्च ट्युल् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः ट्युट्युलौ। सायञ्चिरम्प्राह्लेप्रगेऽव्ययेभ्यः पञ्चम्यन्तं, ट्युट्युलौ प्रथमान्तं, तुट् प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनेकपदं सूत्रम्। कालाट्ठञ् से वचनविपरिणाम करके

कालेभ्यः की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

कालवाचक सायम्, चिरम्, प्राह्णे, प्रगे और कालवाची अव्ययों से तद्धितसंज्ञक ट्यु और ट्युल् प्रत्यय होते हैं और उनको तुट् का आगम भी होता है।

इन प्रत्ययों में टकार और लकार इत्संज्ञक हैं। यु बचता है। आगम तुट् में उकार और टकार इत्संज्ञक हैं, त् बचता है। यु के स्थान पर युवोरनाकौ से अन आदेश हो जाता है। टित्करण का प्रयोजन स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्० सूत्र की प्रवृत्ति है। सायम् और चिरम् शब्द को ट्यु और ट्युल् प्रत्यय के योग में मकारान्तत्व निपातन था तथा प्राह्णे और प्रगे इन दो शब्दों से इसी सूत्र से एदन्तत्व निपातन भी किया जाता है।

सायन्तनम्। शाम को होने वाला। साये भवम्। साय डि में कालाट्ठञ् से ठञ् प्राप्त था, उसे बाधकर सायञ्चिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च से साय को मकारान्तत्व निपातन सहित ट्यु प्रत्यय अनुबन्धलोप, युवोरनाकौ से यु के स्थान पर अन आदेश करके उसको तुट् का आगम भी हुआ। सायम्+त्+अन बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके मकार को अनुस्वार और परसवर्ण करने के बाद वर्णसम्मेलन करके सायन्तन बनता है एवं स्वादिकार्य करने पर सायन्तनम् सिद्ध हो जाता है।

चिरन्तनम्। अधिक काल तक होने वाला। चिरे भवम्। चिर डि में कालाट्ठञ् से ठञ् प्राप्त था, उसे बाधकर सायञ्चिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च से चिर को मकारान्तत्व निपातन सहित ट्यु प्रत्यय अनुबन्धलोप, युवोरनाकौ से यु के स्थान पर अन आदेश करके उसको तुट् का आगम भी हुआ। चिरम्+त्+अन बना। मकार को अनुस्वार और परसवर्ण करने के बाद वर्णसम्मेलन करके चिरन्तन बनता है एवं स्वादिकार्य करने पर चिरन्तनम् सिद्ध हो जाता है।

प्रगेतनम्। प्रातः होने वाला। प्रगे भवम्। प्रगे डि में कालाट्ठञ् से ठञ् प्राप्त था, उसे बाधकर सायञ्चिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च से प्रगे को एदन्तत्व निपातन सहित ट्यु प्रत्यय अनुबन्धलोप, युवोरनाकौ से यु के स्थान पर अन आदेश करके उसको तुट् का आगम भी हुआ। प्रगे+त्+अन बना और वर्णसम्मेलन करके स्वादिकार्य करने पर प्रगेतनम् सिद्ध हो जाता है। इसी तरह प्राह्णेतनम् भी बनता है।

दोषातनम्। रात्रि में होने वाला। दोषा भवम्। दोषा इस अव्यय से सायञ्चिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च से ट्यु प्रत्यय अनुबन्धलोप, युवोरनाकौ से यु के स्थान पर अन आदेश करके उसको तुट् का आगम भी हुआ। दोषा+त्+अन बना और वर्णसम्मेलन करके स्वादिकार्य करने पर दोषातनम् सिद्ध हो जाता है।