एण्यापवादः। प्रावृषिकः।
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१०८८- प्रावृषष्ठप्। प्रावृषः पञ्चम्यन्तं, ठप् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तत्र जातः का अनुवर्तन एवं
प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
..... सप्तम्यन्त प्रावृष् इस प्रातिपदिक से जातः के अर्थ में ठप् प्रत्यय होता है।
यह प्रावृष् एण्यः का अपवाद है। अन्य जगहों पर प्रावृष् से एण्य ही होता है किन्तु जातः अर्थ में ठप् होगा। पकार इत्संज्ञक है, ठ शेष रहता है। ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश होता है।
प्रावृषिकः। वर्षा में उत्पन्न होने वाला। प्रावृषि जातः लौकिक विग्रह और प्रावृष् डि अलौकिक विग्रह है। प्रावृष् एण्यः को बाधकर तत्र जातः के अर्थ में प्रावृष्छप् से ठप् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, इक आदेश होकर प्रावृष्+इक बना है। भसंज्ञक अकार का लोप करके प्रावृष्+इक=प्रावृषिक बना, सु के बाद रुत्वविसर्ग करके प्रावृषिकः सिद्ध हुआ।