कालवाचिभ्यष्ठञ् स्यात्। कालिकम्। मासिकम्। सांवत्सरिकम्।
वार्तिकम्- अव्ययानां भमात्रे टिलोपः। सायम्प्रातिकः। पौनःपुनिकः।
१०८४- कालाट्ठञ्। कालात् पञ्चम्यन्तं, ठञ् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, उच्चाप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
कालवाचक सभी शब्दों से ठञ् ही होता है, शेष अर्थ में।
ठञ् में जकार इत्संज्ञक है, अतः आदिवृद्धि होती है। ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश होता है।
कालिकम्। काल अर्थात् समय पर होने वाला या उत्पन्न। काले जातं भवं वा यह लौकिक विग्रह है और काल डि यह अलौकिक विग्रह है। कालाट्ठञ् से ठञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इक आदेश करके काल+इक बना। आदिवृद्धि होने पर आकार के स्थान पर आकार ही हुआ और भसंज्ञक अकार का लोप हुआ- काल्+इक=कालिक बना। प्रातिपदिक होने से सु आया और उसके स्थान पर अम् आदेश, पूर्वरूप होकर कालिकम् सिद्ध हुआ।
मासिकम्। महीने में होने वाला या उत्पन्न। मासे जातं भवं वा लौकिक विग्रह और मास डि अलौकिक विग्रह है। कालाट्ठञ् से ठञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इक आदेश करके मास+इक बना। आदिवृद्धि होने पर आकार के स्थान पर आकार ही हुआ और भसंज्ञक अकार का लोप हुआ- मास्+इक=मासिक बना। सामान्य में नपुंसक है। प्रातिपदिकत्वेन सु आया और उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप होकर मासिकम् सिद्ध हुआ।
सांवत्सरिकम्। वर्ष में होने वाला या उत्पन्न। संवत्सरे जातं भवं वा लौकिक विग्रह और संवत्सर डि अलौकिक विग्रह है। कालाट्ठञ् से ठञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इक आदेश करके संवत्सर+इक बना। आदिवृद्धि होने पर आकार के स्थान पर आकार हुआ और भसंज्ञक अकार का लोप हुआ- सांवत्सर्+इक=सांवत्सरिक बना। सु, उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप होकर सांवत्सरिकम् सिद्ध हुआ।
अव्ययानां भमात्रे टिलोपः। यह वार्तिक है। भसंज्ञामात्र होते ही अव्ययों के टि का लोप होता है। जिस प्रकार से नस्तद्धिते सूत्र नकारान्त भसंज्ञक टि का लोप करता है और टेः डित् परे रहने पर टि का लोप करता है, उसी तरह अव्ययों में नहीं होता। वहाँ पर भसंज्ञा हुई है तो इतने मात्र से इस वार्तिक के बल पर अव्ययों के टि का लोप हो जाता है।
सायम्प्रातिकम्। शाम सबेरे होने वाला या उत्पन्न। सायं च प्रातश्च सायंप्रातः, तत्र जातं भवं वा लौकिक विग्रह और सायम्प्रातर् अलौकिक विग्रह है। यह अव्यय भी है। कालाट्ठञ् से ठञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इक आदेश करके सायम्प्रातर्+इक बना।
आदिवृद्धि होने पर आकार के स्थान पर आकार ही हुआ और भसंज्ञक अकार, इकार न होने के कारण टि का लोप प्राप्त नहीं था, इसलिए वार्तिक बनाया- अव्ययानां भमात्रे टिलोपः। इससे सायम्प्रातर् में टिसंज्ञक अर् का लोप हुआ, सायम्प्रात्+इक=सायम्प्रातिक बना। सामान्य में नपुंसक। सु आया, उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप होकर सायम्प्रातिकम् सिद्ध हुआ।
पौनःपुनिकम्। बार बार होने वाला या उत्पन्न। पुनर् यह अव्यय है, इसका दो बार उच्चारण है पुनःपुनर्। पुनःपुनः जातं भवं वा लौकिक विग्रह और पुनःपुनर् अलौकिक विग्रह है। कालाट्ठञ् से ठञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इक आदेश करके पुनःपुनर्+इक बना। आदिवृद्धि होने पर पु के उकार के स्थान पर औकार हुआ और भसंज्ञक अकार, इकार न होने के कारण टि का लोप प्राप्त नहीं था, इसलिए वार्तिक बनाया- अव्ययानां भमात्रे टिलोपः। इससे पौनःपुनर् में टिसंज्ञक अर् का लोप हुआ, पौनःपुन्+इक=पौनःपुनिक बना। सु, उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप होकर पौनःपुनिकम् सिद्ध हुआ।