Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1082
त्व-मावादेशविधायकं विधिसूत्रम्
प्रत्ययोत्तरपदयोश्च
Aṣṭādhyāyī 7.2.98
Vṛtti Varadarājācārya

मपर्यन्तयोरेतयोरेकार्थवाचिनोस्त्वमौ स्तः, प्रत्यये उत्तरपदे च परतः।

त्वदीयः। मदीयः। त्वत्पुत्रः। मत्पुत्रः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०८२- प्रत्ययोत्तरपदयोश्च। प्रत्ययश्च उत्तरपदं च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः प्रत्ययोत्तरपदे, तयोः। प्रत्ययोत्तरपदयोः सप्तम्यन्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में त्वमावेकवचने से त्वमौ और एकवचने, युष्मदस्मदोरनादेशे से युष्मदस्मदोः और मपर्यन्तस्य से मपर्यन्तस्य की अनुवृत्ति आती है।

एकवचन का विषय हो और प्रत्यय या उत्तरपद परे हो तो युष्मद् और अस्मद् शब्द के मपर्यन्त भाग अर्थात् युष्म् और अस्म् के स्थान पर त्व और म आदेश होते हैं।

यहाँ पर भी यथासंख्यमनुदेशः समानाम् के नियम से युष्मद् के स्थान पर त्व और अस्मद् के स्थान पर म आदेश होंगे।

युष्मदीयः, यौष्माकीणः, यौष्माकः, तावकीनः, तावकः, त्वदीयः। युष्मद् शब्द के इन अन्तिम तीन रूप केवल एकवचन के विषय हैं और आदि के तीन रूप द्विवचन और बहुवचन के विषय हैं। पहले के तीन रूपों का लौकिक विग्रह युवयोर्युष्माकं वा अयम् (तुम दोनों का या तुम सब का यह) तथा शेष तीन रूपों का विग्रह तव अयम् (तुम्हारा यह) इसी प्रकार पहले के तीन रूपों का अलौकिक विग्रह युष्मद् ओस् या युष्मद् आम् शेष तीन रूपों का युष्मद् डस् है। ऐसी अवस्था में युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से छ प्रत्यय करके प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से छ के छकार के स्थान पर ईय् आदेश करके युष्मद्+ईय बना, वर्णसम्मेलन होने पर युष्मदीय बना। सु, रुत्वविसर्ग करके युष्मदीयः सिद्ध हुआ। यह प्रथमरूप है। युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से खजू होने के पक्ष में अनुबन्ध जकार का लोप करके ख बचा, उस खकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ईन् आदेश करके ईन बना, इस तरह युष्मद्+ईन बन गया। ईन के परे रहते तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ से युष्मद् के स्थान पर युष्माक आदेश हुआ, युष्माक+ईन बना। खजू में विद्यमान जित्व स्थानिवद्भावेन ईन में भी आ गया और उसे जित् मानकर तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर यु के उकार के स्थान पर औकार होकर यौष्माक+ईन बना। भसंज्ञक ककारोत्तरवर्ती अकार का यस्येति च से लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर यौष्माकीन बना।

प्रकार से परे नकार को अट्कुप्वाड्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व होकर यौष्माकीण बना। सु, रुत्वविसर्ग करके यौष्माकीणः सिद्ध हुआ। यह दूसरा रूप है। छ और खञ् ये दोनों प्रत्यय वैकल्पिक हैं। इनके न होने के पक्ष में शेषे से अण् प्रत्यय होगा और अण् के परे होने पर भी तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ से युष्माक आदेश होगा ही। इस तरह से युष्माक+अ इस स्थिति में आदिवृद्धि होने पर यौष्माक+अ, भसंज्ञक अकार का लोप होने पर यौष्माक+अ, वर्णसम्मेलन करके यौष्माक और रुत्व-विसर्ग करके यौष्माकः सिद्ध हुआ। यह तीसरा रूप है। इस प्रकार से पहले के तीन रूप सिद्ध हुए। अब एकवचन का विषय होने पर युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से खञ् होने के पक्ष में युष्मद्+ईन बना। तवकममकावेकवचने से युस्मद् के स्थान पर तवक आदेश हुआ, तवक+ईन बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप, करके तावक+ईन=तावकीन, सु, रुत्वविसर्ग होने पर तावकीनः सिद्ध हुआ। यह चौथा रूप है। छ प्रत्यय होने के पक्ष का रूप आगे बतायेंगे। उसके पहले खञ् और छ न होने के पक्ष में शेषे से अण् प्रत्यय हुआ। अण् के परे होने पर भी तवकममकावेकवचने से तवक आदेश हुआ, तवक+अ बना। आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके तावक, सु, रुत्वविसर्ग करके तावकः सिद्ध हुआ। यह पाँचवाँ रूप है। अब युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से छ होने के पक्ष में छकार के स्थान पर ईय् आदेश करके युष्मद्+ईय बना। प्रत्यय के परे रहते प्रत्ययोत्तरपदयोश्च से युष्मद् के मपर्यन्त भाग युष्म् के स्थान पर त्व आदेश हुआ। त्व+अद्+ईय बना। त्व+अद् में अतो गुणे से पररूप एकादेश होकर त्वद् बना। त्वद्+ईय=त्वदीय बनने के बाद सु, रुत्वविसर्ग करके त्वदीयः सिद्ध हुआ। यह छठा रूप है। इस प्रकार से युष्मद् शब्द से छ, खञ् और अण् प्रत्यय एवं उसके स्थान पर युष्माक, तवक और त्व आदेश करने से छः रूप युष्मदीयः, यौष्माकीणः, यौष्माकः, तावकीनः, तावकः, त्वदीयः सिद्ध हुए। आप ध्यान लगाकर साधेंगे तो कोई कठिन नहीं है। इनके स्त्रीलिङ्ग में टाप्, डीप् आदि करके युष्मदीया, यौष्माकीणा, यौष्माकी, तावकीना, तावकी, त्वदीया ये रूप बनते हैं और नपुंसकलिङ्ग में युष्मदीयम्, यौष्माकीणम्, यौष्माकम्, तावकीनम्, तावकम्, त्वदीयम् बन जाते हैं। पुँल्लिङ्ग में राम की तरह, स्त्रीलिङ्ग में युष्मदीया, यौष्माकीणा, तावकीना और त्वदीया के रूप रमा शब्द की तरह तथा यौष्माकी, तावकी के रूप नदी की तरह चलेंगे। नपुंसक में ज्ञान शब्द की तरह होते ही हैं।

अस्मदीयः, आस्माकीनः, आस्माकः, मामकीनः, मामकः, मदीयः। अस्मद् शब्द के ये अन्तिम तीन रूप केवल एकवचन के विषय हैं और आदि के तीन रूप द्विवचन और बहुवचन के विषय हैं। पहले के तीन रूपों का लौकिक विग्रह आवयोः अस्माकं वा अयम् (हम दोनों का या हम सब का यह) तथा शेष तीन रूपों का विग्रह मम अयम् (मेरा यह) इसी प्रकार पहले के तीन रूपों का अलौकिक विग्रह अस्मद् ओस् या अस्मद् आम् शेष तीन रूपों का अस्मद् डन्स् है। ऐसी अवस्था में युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से छ प्रत्यय करके प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् और आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से छ के छकार के स्थान पर ईय् आदेश करके अस्मद्+ईय बना, वर्णसम्मेलन होने पर अस्मदीय बना। सु, रुत्वविसर्ग करके अस्मदीयः सिद्ध हुआ। यह प्रथम रूप है। युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से खञ् होने के पक्ष में अनुबन्ध ञकार का लोप करके ख बचा। खकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से

ईन् आदेश करके ईन बना, इस तरह अस्मद्+ईन बन गया। ईन के परे रहते तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ से अस्मद् के स्थान पर अस्माक आदेश हुआ, अस्माक+ईन बना। खञ् में विद्यमान जित्व स्थानिवद्भावेन ईन में भी आ गया और जित् मानकर तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करने पर अकार के स्थान पर आकार होकर आस्माक+ईन बना। भसंज्ञक ककारोत्तरवर्ती अकार का यस्येति च से लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर आस्माकीन बना। षकार से परे न होने के कारण अट्कुप्वाङ्नुम्ब्यवायेऽपि से णत्व नहीं हो सका आस्माकीन ही रहा। सु, रुत्वविसर्ग करके आस्माकीनः सिद्ध हुआ। यह दूसरा रूप है। छ और खञ् ये दोनों प्रत्यय वैकल्पिक हैं। इनके न होने के पक्ष में शेषे से अण् प्रत्यय होगा और अण् के परे होने पर भी तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ से अस्माक आदेश होगा ही। इस तरह से अस्माक+अ, आदिवृद्धि होने पर आस्माक+अ, भसंज्ञक अकार का लोप होने पर आस्माक+अ, वर्णसम्मेलन करके आस्माक और रुत्व-विसर्ग करके आस्माकः सिद्ध हुआ। यह तीसरा रूप है। इस प्रकार से पहले के तीन रूप सिद्ध हुए। अब एकवचन का विषय होने पर युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से खञ् होने के पक्ष में अस्मद्+ईन बना। तवकममकावेकवचने से अस्मद् के स्थान पर ममक आदेश हुआ, ममक+ईन बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप करके मामक्+ईन=मामकीन, सु, रुत्वविसर्ग होने पर मामकीनः सिद्ध हुआ। यह चौथा रूप है। छ प्रत्यय होने के पक्ष का आगे बतायेंगे। उसके पहले खञ् और छ न होने के पक्ष में शेषे से अण् प्रत्यय हुआ। अण् के परे होने पर भी तवकममकावेकवचने से ममक आदेश हुआ, ममक+अ बना। आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके मामक, सु, रुत्वविसर्ग करके मामकः सिद्ध हुआ। यह पाँचवाँ रूप है। अब युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च से छ होने के पक्ष में छकार के स्थान पर ईय् आदेश करके अस्मद्+ईय बना। प्रत्यय के परे रहते प्रत्ययोत्तरपदयोश्च से अस्मद् के मपर्यन्त भाग अस्म् के स्थान पर म आदेश हुआ। म+अद्+ईय बना। म+अद् में अतो गुणे से पररूप एकादेश होकर मद् बना। मद्+ईय=मदीय बनने के बाद सु, रुत्वविसर्ग करके मदीयः सिद्ध हुआ। यह छठा रूप है। इस प्रकार से अस्मद् शब्द से छ, खञ् और अण् प्रत्यय एवं उसके स्थान पर अस्माक, ममक और म आदेश करने से छः रूप अस्मदीयः, आस्माकीनः, आस्माकः, मामकीनः, मामकः, मदीयः सिद्ध हुए। इनके स्त्रीलिङ्ग में टाप् आदि करके अस्मदीया, आस्माकीना, आस्माकी, मामकीना, मामकी, मदीया ये रूप बनते हैं और नपुंसकलिङ्ग में अस्मदीयम्, आस्माकीनम्, आस्माकम्, मामकीनम्, मामकम्, मदीयम् बन जाते हैं। पुँल्लिङ्ग में राम की तरह, स्त्रीलिङ्ग में आस्माकीना, अस्मदीया, मामकीना, मदीया के रूप रमा शब्द की तरह तथा आस्माकी, मामकी के रूप नदी की तरह चलेंगे। नपुंसकलिङ्ग में ज्ञान शब्द की तरह ही होते हैं।