वृद्धसंज्ञानि स्युः।
१०७६- त्यदादीनि च। त्यदादीनि प्रथमान्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्।
सर्वादिगण के अन्तर्गत जो त्यदादिगण पठित है, उसमें पढ़े गये शब्दों की भी वृद्धसंज्ञा होती है।