Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1077
छ-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
वृद्धाच्छः
Aṣṭādhyāyī 4.2.114
Vṛtti Varadarājācārya

शालीयः। मालीयः। तदीयः।

वार्तिकम्- वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या। देवदत्तीयः, दैवदत्तः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०७७- वृद्धाच्छः। वृद्धात् पञ्यम्यन्तं, छः प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

..... वृद्धसंज्ञक सुबन्त प्रातिपदिकों से शैक्षिक अर्थ में छ प्रत्यय होता है।

छ में छकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ईय् आदेश होकर ईय बन जाता है।

शालीयः। शाला अर्थात् घर में होने वाला या पैदा हुआ। शालायां जातादि लौकिक विग्रह और शाला डि अलौकिक विग्रह है। शाला में आदि अच् आकार वृद्धसंज्ञक है, अतः इसकी वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् से वृद्धसंज्ञा हुई है। इससे वृद्धाच्छः के द्वारा छ प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके शाला+छ बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से छ् के स्थान पर ईय् आदेश होकर शाला+ईय बना। भसंज्ञक आकार का लोप करके शाल्+ईय बना। वर्णसम्मेलन होने पर शालीय बना। सु, रुत्वविसर्ग करके शालीयः सिद्ध हुआ।

मालीयः। माला में होने वाला सूता, धागा आदि। मालायां जातादि लौकिक विग्रह और माला डि अलौकिक विग्रह है। माला में आदि अच् आकार वृद्धसंज्ञक है, अतः इसकी वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् से वृद्धसंज्ञा हुई है। इससे वृद्धाच्छः के द्वारा छ प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके माला+छ बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से छ् के स्थान पर ईय् आदेश होकर माला+ईय बना। भसंज्ञक आकार का लोप करके माल्+ईय बना। वर्णसम्मेलन होने पर मालीय बना और सु, रुत्वविसर्ग करके मालीयः सिद्ध हुआ।

तदीयः। उसका यह। तस्य अयम् लौकिक विग्रह और तद् डस् अलौकिक विग्रह है। तद् त्यदादिगणीय है, अतः इसकी त्यदादीनि च से वृद्धसंज्ञा हुई है। इससे वृद्धाच्छः से छ प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके तद्+छ बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से छ् के स्थान पर ईय् आदेश होकर तद्+ईय बना। वर्णसम्मेलन होने पर तदीय बना और सु, रुत्वविसर्ग करके तदीयः सिद्ध हुआ।

वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या। यह वार्तिक है। नामवाचक शब्दों की विकल्प से वृद्धसंज्ञा होती है। देवदत्त नामवाचक शब्द है, वृद्धसंज्ञा की प्राप्ति नहीं थी तो इस वार्तिक से नामवाचक की वैकल्पिक वृद्धसंज्ञा की गई। अतः वृद्धाच्छः से छ होकर देवदत्तीयः, सिद्ध हुआ। वृद्धसंज्ञा न होने के पक्ष में छ भी नहीं हुआ तो शेषे से अण्-प्रत्यय, आदिवृद्धि, भसंज्ञक का लोप करके सु आदि करने पर देवदत्तः भी बनता है। इसी प्रकार सभी नामवाचक शब्दों के विषय में समझना चाहिए।

देवदत्तीयः, देवदत्तः। देवदत्त का यह। देवदत्तस्यायम्। देवदत्त डस् से वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या वार्तिक द्वारा विकल्प से वृद्धसंज्ञा करके वृद्धाच्छः से छ प्रत्यय, ईय् आदेश आदि होकर देवदत्तीयः बनता है। संज्ञा न होने के पक्ष में तस्येदम् से अण् होकर देवदत्तः बन जाता है।