Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1074
त्यप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अव्ययात्त्यप्
Aṣṭādhyāyī 4.2.104
Vṛtti Varadarājācārya

वार्तिकम्- अमेह-क्व-तसि-त्रेभ्य एव।

अमात्यः। इहत्यः। क्वत्यः। ततस्त्यः। तत्रत्यः।

वार्तिकम्- त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्। नित्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०७४- अव्ययात्त्यप्। अव्ययात् पञ्चम्यन्तं, त्यप् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

अव्ययों से परे त्यप् प्रत्यय होता है।

पकार इत्संज्ञक है, त्य बचता है। सभी अव्ययों से प्राप्त हो रहा था, अतः अग्रिम वार्तिक से सीमित किया गया है।

अमेहक्वतसित्रेभ्य एव। यह वार्तिक है। सभी अव्ययों से त्यप् न होकर केवल अमा, इह, क्व, तसिल्-प्रत्ययान्त और त्रल्-प्रत्ययान्त मात्र अव्ययों से त्यप्-प्रत्यय हो।

अमात्यः। अमा इस अव्यय का साथ अर्थ लिया गया है। साथ या समीप में होने वाला, मन्त्री आदि। अमा( सह ) वर्तते लौकिक विग्रह और अमा( अव्यय होने के कारण विभक्ति नहीं है ) अलौकिक विग्रह है। अव्ययात्यप् से त्यप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, अमा+त्य बना। जित्, णित्, कित् न होने के कारण आदिवृद्धि का प्रसंग नहीं है और अजादि या यकारादि प्रत्यय परे न मिलने के कारण भसंज्ञक नहीं है, अतः भसंज्ञक के लोप होने का प्रसङ्ग भी नहीं है। अमात्य से सु, रुत्व-विसर्ग करके अमात्यः सिद्ध हुआ। अब इसी प्रकार से यहाँ होने वाला अर्थ में इह से इहत्यः, कहाँ होने वाला अर्थ में क्व से क्वत्यः, वहाँ से होने वाला अर्थ में तसिल्-प्रत्ययान्त ततस् से ततस्त्यः, वहाँ होने वाला अर्थ में त्रल्-प्रत्ययान्त तत्र से तत्रत्यः।

त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। नि इस अव्यय से परे त्यप् प्रत्यय हो ऐसा कहना चाहिए।

नित्यः। सदा होने वाला। नि उपसर्ग से त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम् वार्तिक के द्वारा त्यप् प्रत्यय होकर नित्यः बन जाता है। इसका अर्थ सर्वकाल, निश्चित और नियत अर्थ लिया जायेगा। १०७५- वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम्। वृद्धिः प्रथमान्तं, यस्य षष्ठ्यन्तम्, अचां षष्ठ्यन्तम्, आदिः प्रथमान्तं, तद् प्रथमान्तं, वृद्धं प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।