दिव्यम्। प्राच्यम्। अपाच्यम्। उदीच्यम्। प्रतीच्यम्।
१०७३- द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत्। द्यौश्च प्राङ् च अपाङ् च उदङ् च प्रत्यङ् च तेषां समाहारद्वन्द्वो द्युप्रागपागुदक्प्रत्यक्, तस्मात्। द्युप्रागपागुदक्प्रतीचः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
दिव्, प्राञ्च्, अपाञ्च्, उदञ्च् और प्रत्यञ्च् से शैषिक अर्थों में यत्-प्रत्यय होता है।
तकार इत्संज्ञक है। दिव् को छोड़कर शेष शब्द क्रमशः प्र, अप, उत् और प्रति उपसर्गपूर्वक अञ्चु धातु से बने हैं। नकार से बने जकार का लोप आदि करने पर ये प्राच्, अपाच्, उदीच्, प्रत्यच् ऐसे बन जाते हैं। इनसे यत् का विधान किया गया है।
दिव्यम्। स्वर्ग में होने वाला या पैदा हुआ। दिवि जातादि लौकिक विग्रह और दिव् डि अलौकिक विग्रह है। द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके दिव्+य बना। जित्, णित्, कित् न होने के कारण आदिवृद्धि का प्रसङ्ग नहीं है और हलन्तशब्द होने के कारण भसंज्ञक इकार, अकार के लोप होने का प्रसंग ही नहीं है। वर्णसम्मेलन होने पर दिव्य बना। सु, अम्, पूर्वरूप करके दिव्यम् सिद्ध हुआ।
प्राच्यम्। पूर्व दिशा या पूर्व देश में होने वाला या पैदा हुआ। प्राचि जातादि लौकिक विग्रह और प्राच् डि अलौकिक विग्रह है। द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके प्राच्+य बना। जित्, णित्, कित् न होने के कारण आदिवृद्धि का प्रसंग नहीं है एवं हलन्तशब्द होने के कारण भसंज्ञक इकार और अकार के लोप होने का प्रसङ्ग नहीं है। वर्णसम्मेलन होने पर प्राच्य बना। सु, अम्, पूर्वरूप करके प्राच्यम् सिद्ध हुआ। अब इसी प्रकार अपाच् से अपाच्यम्, उदीच् से उदीच्यम् और प्रतीच् से प्रतीच्यम् भी बनाइये।