Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1072
त्यक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक्
Aṣṭādhyāyī 4.2.98
Vṛtti Varadarājācārya

दाक्षिणात्यः। पाश्चात्यः। पौरस्त्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०७२- दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक्। दक्षिणा च पश्चात् च पुरश्च तेषां समाहारद्वन्द्वो दक्षिणापश्चात्पुरः, तस्मात्। दक्षिणापश्चात्पुरसः पञ्चम्यन्तं, त्यक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

दक्षिणा, पश्चात् और पुरस् इन अव्ययों से शैषिक अर्थों में त्यक् प्रत्यय होता है।

ककार इत्संज्ञक है, त्य बचता है। कित् होने से किति च से आदिवृद्धि हो सकती है।

दाक्षिणात्यः। दक्षिण दिशा में उत्पन्न या होने वाला। दक्षिणा भवः। दक्षिणा इस अव्यय से दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् से त्यक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके दक्षिणात्य बना। आदिवृद्धि करके स्वादिकार्य होने पर दाक्षिणात्यः सिद्ध हुआ।

पाश्चात्यः। पीछे अर्थात् पश्चिम दिशा में उत्पन्न या होने वाला। पश्चात् भवः। पश्चात् इस अव्यय से दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् से त्यक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पश्चात्+त्य बना। आदिवृद्धि करके स्वादिकार्य होने पर पाश्चात्यः सिद्ध हुआ।

पौरस्त्यः। पहले या पूर्व में उत्पन्न या होने वाला। पुरो भवः। पुरस् इस अव्यय से दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् से त्यक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पुरस्+त्य बना। आदिवृद्धि करके स्वादिकार्य होने पर पौरस्त्यः सिद्ध हुआ।