Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1070
य-खञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ग्रामाद्यखञौ
Aṣṭādhyāyī 4.2.94
Vṛtti Varadarājācārya

ग्राम्यः, ग्रामीणः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०७०- ग्रामाद्यखञौ। ग्रामात् पञ्चम्यन्तं, यखञौ प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्य्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।

ग्राम शब्द से शेष अर्थ में य और खञ् दोनों प्रत्यय होते हैं।

खञ् में अकार इत्संज्ञक है।

ग्राम्यः। ग्राम में होने वाला या पैदा हुआ। ग्रामे जातो भवो वा लौकिक विग्रह और ग्राम डि अलौकिक विग्रह है। ग्रामाद्यखञौ से य प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ग्राम+य बना। भसंज्ञक अकार का लोप होने पर ग्राम्+य वर्णसम्मेलन होने पर ग्राम्य बना। सु और रुत्वविसर्ग करके ग्राम्यः सिद्ध हुआ।

ग्रामीणः। ग्राम में होने वाला या पैदा हुआ। ग्रामे जातादि लौकिक विग्रह और ग्राम डि अलौकिक विग्रह है। ग्रामाद्यखञौ से खञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ग्राम+ख बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ख् के स्थान पर ईन् आदेश होकर भसंज्ञक अकार का लोप होने पर ग्राम्+ईन, वर्णसम्मेलन होने पर ग्रामीन बना। रेफ से परे नकार को णत्व होकर सु, रुत्व-विसर्ग करके ग्रामीणः सिद्ध हुआ।