आभ्यां क्रमाद् घखौ स्तः शेषे। राष्ट्रे जातादि राष्ट्रियः। अवारपारीणः।
वार्तिकम्- अवारपाराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम्।
अवारीणः। पारीणः। पारावारीणः। इह प्रकृतिविशेषाद् घादयष्ट्युट्युलन्ताः
प्रत्यया उच्यन्ते, तेषां जातादयोऽर्थविशेषाः समर्थविभक्तयश्च वक्ष्यन्ते।
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१०६९- राष्ट्रावारपाराद् घखौ। राष्ट्रञ्च अवारपारञ्च तयोः समाहारद्वन्द्वो राष्ट्रावारपारम्, तस्मात्। घश्च खश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो घखौ। राष्ट्रावारपाराद् पञ्चम्यन्तं, घखौ प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का अधिकार है।
शेष अर्थ में राष्ट्र और अवारपार शब्द से क्रमशः घ और ख प्रत्यय होते हैं।
फलतः राष्ट्र से घ और अवारपार से ख प्रत्यय हो जाते हैं। इन दोनों प्रत्ययों में अनुबन्ध नहीं है। घ के घकार के स्थान पर और ख के खकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से क्रमशः इय् और ईन् आदेश होंगे जिससे इय्+अ=इय और ईन्+अ=ईन बनेंगे। घ और ख में जो अकार है, उसके स्थान पर आदेश नहीं होता है। राष्ट्र शब्द से प्रधानतया घ-प्रत्यय ही होता है, जिससे राष्ट्रियः बनता है। हिन्दी में छ प्रत्यय वाला, दीर्घ ईकार वाला रूप राष्ट्रिय भी प्रचलित है किन्तु संस्कृत में घ-प्रत्यय वाला रूप ही शुद्ध है, छ-प्रत्यय वाला नहीं।
अवारपराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। अवारपार शब्द के पृथक् होने व विपरीत होने पर भी ख प्रत्यय होता है, ऐसा कहना चाहिए। जैसे अवारपार शब्द पृथक् हुआ तो अवार और पार बना एवं विपरीत हुआ तो पारावार बना। यह वार्तिक राष्ट्रावारपाराद् घखौ का सहयोगी है।
राष्ट्रियः। राष्ट्र में होने वाला या पैदा हुआ। राष्ट्रे जातादि लौकिक विग्रह और राष्ट्र डि अलौकिक विग्रह है। राष्ट्रावारपाराद् घखौ से घ प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके राष्ट्र+घ बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से घ् के स्थान पर इय् आदेश होकर भसंज्ञक अकार का लोप होने पर राष्ट्र+इय बना। वर्णसम्मेलन होने पर राष्ट्रिय बना। णित्, कित् आदि न होने के कारण आदिवृद्धि का प्रसंग नहीं है। सु, रुत्व-विसर्ग करके राष्ट्रियः सिद्ध हुआ।
अवारपारीणः। इस पार और उस पार होने वाला या पैदा हुआ। अवारपारे जातादि लौकिक विग्रह और अवारपार डि अलौकिक विग्रह है। राष्ट्रावारपाराद् घखौ से ख प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अवारपार+ख बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ख् के स्थान पर ईन् आदेश होकर भसंज्ञक अकार का लोप होने पर अवारपार्+ईन, वर्णसम्मेलन होने पर अवारपारीन बना। णित्, कित् आदि न होने के कारण आदिवृद्धि का प्रसंग नहीं है। रेफ से पर नकार को णत्व होकर सु, रुत्व-विसर्ग करके अवारपारीणः सिद्ध हुआ।
अब इसी प्रकार अवारपार शब्द में विगृहीत(पृथक्) होने पर अवारपराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम् इस वार्तिक की सहायता से राष्ट्रावारपाराद् घखौ से ख-प्रत्यय करके अवार से अवारीणः और पार से पारीणः एवं विपरीत होने पर पारावार से पारावारीणः भी बना सकते हैं।
इह प्रकृतिविशेषाद् घादयष्ट्युट्युलन्ताः प्रत्यया उच्यन्ते, तेषां जातादयो-ऽर्थविशेषाः समर्थविभक्तयश्च वक्ष्यन्ते। इस शैषिक प्रकरण में घ से लेकर ट्यु-ट्युल् प्रत्ययों तक जितने प्रत्यय बताये गये हैं वे विशेष-विशेष प्रकृतियों से ही कहे गये हैं और इनके जातः आदि अर्थविशेष और उनकी समर्थ विभक्तियाँ भी आगे के सूत्रों से कही जायेंगी।