Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 48
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VṛttiGovind
LSK 1068
शेषे
Aṣṭādhyāyī 4.2.92
Vṛtti Varadarājācārya

अपत्यादिचतुर्थ्यन्तादन्योऽर्थः शेषस्तत्राणादयः स्युः।

चक्षुषा गृह्यते चाक्षुषं रूपम्। श्रावणः शब्दः। औपनिषदः पुरुषः।

दृषदि पिष्टा दार्षदाः सक्तवः। चतुर्भिरुह्यं चातुरं शकटम्।

चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः। तस्य विकारः इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः।

श्रीधरमुखोल्लासिनी

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब शैषिकप्रकरण प्रारम्भ होता है। शेषे के अधिकार में किये जाने वाले प्रत्ययों को शैषिक कहा गया है। इस प्रकरण में अनेक प्रत्ययों का विधान है।

१०६८- शेषे। शेषे सप्तम्यन्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, उच्चाप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार तथा प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है। यह अधिकार और अनुवर्तन पूरे शैषिक में रहेगा। यहाँ पर शेष शब्द का- अपत्य अर्थ से लेकर चतुर्थी तक के अर्थों से भिन्न अर्थ लिया गया है।

शेष अर्थ में समर्थ प्रातिपदिकों से अण् आदि प्रत्यय होते हैं।

शेष बचे हुए को कहा जाता है। तद्धितप्रकरण के प्रारम्भ से अर्थात् अपत्याधिकार से चातुर्थिकप्रकरण तक जितने अर्थों में प्रत्यय हुआ है, उससे भिन्न अर्थ को शेष कहते हैं। शेष अर्थ में अण् प्रत्यय अथवा यथाप्राप्त प्रत्यय होंगे। इस सूत्र को विधिसूत्र और अधिकारसूत्र दोनों माना गया है। विधिसूत्र होने के कारण चाक्षुषम् आदि रूपों की सिद्धि होती है और अधिकारसूत्र मानकर आगे के सूत्रों में शेषे का अधिकार चला जाता है।

चाक्षुषम्। नेत्रों के द्वारा जिसका ग्रहण होता है, वह अर्थात् रूप। चक्षुषा गृह्यते लौकिक विग्रह और चक्षुष् टा अलौकिक विग्रह है। शेषे से अण् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके चक्षुष्+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके चाक्षुष्+अ=चाक्षुष बना। सु, नपुंसकलिङ्ग होने के कारण सु के स्थान पर अम् आदेश, पूर्वरूप करके चाक्षुषम् सिद्ध हुआ।

श्रावणः। कानों के द्वारा जिसका ग्रहण होता है, शब्द। श्रवणेन गृह्यते लौकिक विग्रह और श्रवण टा अलौकिक विग्रह है। शेषे से अण् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का

लुक् करके श्रवण+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके

भसंज्ञक अकार का लोप करके श्रावण+अ=श्रावण बना। सु, रुत्वविसर्ग करके श्रावणः

सिद्ध हुआ।

औपनिषदः। उपनिषद् में जाना गया पुरुष अथवा उपनिषदों के द्वारा प्रतिपादित

पुरुष, आत्मा। उपनिषदि ज्ञातः अथवा उपनिषद्भिः प्रतिपतिपादितः लौकिक विग्रह और

उपनिषद् डि अथवा भिस् अलौकिक विग्रह है। शेषे से अण् प्रत्यय, प्रतिपदिकसंज्ञा, सुप्

का लुक् करके उपनिषद्+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि

करके उकार के स्थान पर ओकार, औपनिषद्+अ=औपनिषद बना। सु, रुत्वविसर्ग करके

औपनिषदः सिद्ध हुआ। औपनिषदः पुरुषः।

दार्षदाः। पत्थर, चक्की में पीसे गये, सत्तू आदि। दृषदि पिष्टाः लौकिक विग्रह

और दृषद् डि अलौकिक विग्रह है। शेषे से अण् प्रत्यय, प्रतिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्

करके दृषद्+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से रपरसहित आदिवृद्धि करके

ऋकार के स्थान पर आर्, द्+आर्+षद्+अ=दार्षद बना। जस्, पूर्वसवर्णदीर्घ, रुत्वविसर्ग

करके दार्षदाः सिद्ध हुआ। सत्तू। दार्षदाः सक्तवः।

चातुरम्। चार प्राणियों, घोड़ों या व्यक्तियों के द्वारा खींचा जाने वाला छकड़ा

या पालकी। चतुर्भिः उह्यते लौकिक विग्रह और चतुर् भिस् अलौकिक विग्रह है। शेषे से

अण् प्रत्यय, प्रतिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके चतुर्+अ बना। णित् होने के कारण

तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके अकार के स्थान पर आकार, चातुर्+अ=चातुर बना।

सु, अम्, चातुरम् सिद्ध हुआ। चातुरं शकटम्।

चातुर्दशम्। चतुर्दशी को दिखाई देने वाला अर्थात् राक्षस। चतुर्दश्यां दृश्यते

लौकिक विग्रह और चतुर्दशी डि अलौकिक विग्रह है। शेषे से अण् प्रत्यय, प्रतिपदिकसंज्ञा,

सुप् का लुक् करके चतुर्दशी+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि

करके अकार के स्थान पर आकार, भसंज्ञक ईकार का लोप, चातुर्दश्+अ=चातुर्दश बना।

सु, अम्, चातुर्दशम् सिद्ध हुआ। चातुर्दशं रक्षः।

शैक्षिक आदि प्रत्ययों के सम्बन्ध में एक श्लोक प्रसिद्ध है-

शैक्षिकान्मतुबर्थीयाच्छैक्षिको मतुबर्थिकः।

सरूपः प्रत्ययो नेष्टः सन्नन्तान्न सनिष्यते॥ अर्थात् शैक्षिक प्रत्ययान्त से पुनः

उसी रूप वाला शैक्षिक प्रत्यय नहीं हुआ करता। इसी तरह मतुबर्थीय प्रत्ययान्त से पुनः उसी

रूप वाला मतुबर्थीय प्रत्यय भी नहीं होता। एवं च इच्छा अर्थ में हुए सन् प्रत्ययान्त से दुबारा

सन् प्रत्यय नहीं होता।