Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 47
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VṛttiGovind
LSK 1061
प्रकृतिविधिधायकमतिदेशसूत्रम्
लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने
Aṣṭādhyāyī 1.2.51
Vṛtti Varadarājācārya

लुपि सति प्रकृतिविल्लिङ्गवचने स्तः।

पञ्चालानां निवासो जनपदः पञ्चालाः। कुरवः। अङ्गाः। वङ्गाः। कलिङ्गाः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०६१. लुपि युक्तवद् व्यक्तिवचने। युक्तेन तुल्यं युक्तवत्। व्यक्तिश्च वचनं च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः व्यक्तिवचने। लुपि सप्तम्यन्तं, युक्तवत् अव्ययं, व्यक्तिवचने प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्।

प्रत्यय के लुप् होने पर शब्द में प्रकृति के समान ही लिङ्ग और वचन होते हैं।

सूत्र में आया हुआ युक्त शब्द का प्रकृति तथा व्यक्ति शब्द का लिङ्ग और वचन शब्द का संख्या अर्थ है। तात्पर्य यह है लुप् किये प्रत्यय जिस प्रकृति से विहित हुए हैं, उनके लुप् के बाद प्रकृति के अनुसार ही लिङ्ग और वचन होना चाहिए, उसके विशेष्य के अनुसार नहीं लगाना चाहिए।

पञ्चालाः। पञ्चालों के जनपद। पञ्चालानां जनपदः। यहाँ पर विशेष्य पद है जनपदः और प्रकृति है पञ्चालाः। यह प्रथमान्त बहुवचन और पुँल्लिङ्ग है। पञ्चाल आम् से निवास जनपद अर्थ में अण् का विधान हुआ, उसका जनपदे लुप् से लुप् हो गया अर्थात् अदर्शन हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् के लुक् के पश्चात् लुपि युक्तवद् व्यक्तिवचने से युक्तवद्भाव अर्थात् प्रकृतिवद्भाव हुआ। फलतः जनपदः इस विशेष्य के अनुसार लिङ्गवचन न होकर प्रकृति के अनुसार बहुवचन ही हुआ। जिससे जस् विभक्ति की उपस्थिति होकर पञ्चालाः सिद्ध हुआ। इसी तरह कुरवः, अङ्गाः, वङ्गाः, कलिङ्गाः के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए।