१०५१- अचित्तहस्तिधेनोष्ठक्। अविद्यमानं चित्तं येषां ते अचित्ताः। अचित्ताश्च हस्ती च धेनुश्च तेषां समाहारद्वन्द्वः अचित्तहस्तिधेनुः, सौत्रं पुंस्त्वम्। तस्मात्। अचित्तहस्तिधेनोः पञ्चम्यन्तं, ठक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्य समूहः का अनुवर्तन है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
चित्त-रहित अर्थात् अप्राणिवाचक षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिकों से एवं
हस्तिन्, धेनु इन प्रातिपदिकों से 'उसका समूह' अर्थ में उक् प्रत्यय होता है।
ककार इत्संज्ञक है और उ के स्थान पर उस्येकः से इक आदेश होता है। कुछ
स्थलों पर अग्रिम सूत्र से क आदेश भी होता है।