तलन्तं स्त्रियाम्। ग्रामता। बन्धुता। जनता।
वार्तिकम्- गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम्। गजता। सहायता।
वार्तिकम्- अह्नः खः क्रतौ। अहीनः।
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१०५०- ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल्। ग्रामश्च जनश्च बन्धुश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो ग्रामजनबन्धवस्तेभ्यः। ग्रामजनबन्धुभ्यः पञ्चम्यन्तं, तल् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्य समूहः का अनुवर्तन है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
ग्राम, जन और बन्धु इन षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में तद्धितसंज्ञक तल् प्रत्यय होता है।
लकार इत्संज्ञक है। तलन्तं स्त्रियाम्। यह लिङ्गानुशासन का सूत्र है। तल् प्रत्ययान्त शब्द का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में ही होता है।
ग्रामता। गावों का समूह। ग्रामाणां समूहः। ग्राम आम् से ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल् से तल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ग्रामत बना है। तलन्त होने के कारण स्त्रीलिङ्ग में अजाद्यतष्टाप् से टाप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सवर्णदीर्घ करके ग्रामता बन जाता है। इससे सु एवं उसका हल्ड्यादिलोप होकर ग्रामता सिद्ध हो जाता है।
जनता। जनों का समूह। जनानां समूहः। जन आम् से ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल् से तल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके जनत बना है। तलन्त होने के कारण स्त्रीलिङ्ग में अजाद्यतष्टाप् से टाप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सवर्णदीर्घ करके जनता बन जाता है। इससे सु एवं उसका हल्ड्यादिलोप होकर जनता सिद्ध हो जाता है।
गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। गज और सहाय इन षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिकों से भी समूह अर्थ में तल् प्रत्यय हो, ऐसा कहना चाहिए। तात्पर्य यह है कि ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल् सूत्र में जो केवल तीन शब्दों से तल् का विधान किया गया है, वह कम है, न्यून है। उसमें गज और सहाय शब्दों को जोड़ देना चाहिए।
गजता। हाथियों का समूह। गजानां समूहः। गज आम् से गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम् से तल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, टाप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सवर्णदीर्घ, स्वादिकार्य करके जनता सिद्ध हो जाता है।
सहायता। सहायकों का समूह। सहायानां समूहः। सहाय आम् से गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम् से तल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, टाप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सवर्णदीर्घ, स्वादिकार्य करके सहायता सिद्ध हो जाता है।
अह्नः खः क्रतौ। यह वार्तिक है। यज्ञ के विषय में वर्तमान षष्ठ्यन्त अहन् प्रातिपदिक से समूह अर्थ में ख प्रत्यय होता है।
ख में से केवल ख् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ईन् आदेश होकर ईन बन जाता है।
अहीनः। कुछ यज्ञक्रियाविशेष का समूह। अह्नां समूहः। अहन् आम् में अह्नः खः क्रतौ से ख प्रत्यय, खकार के स्थान पर ईन् आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अहन्+ईन बना। नस्तद्धिते से भसंज्ञक टि का लोप करके अह्+ईन बना। वर्णसम्मेलन, स्वादिकार्य करके अहीनः सिद्ध हुआ।