इस्-उस्-उक्-तान्तात् परस्य उस्य कः। साक्तुकम्। हास्तिकम्। धैनुकम्।
१०५२- इसुसुक्तान्तात् कः। इस् च उस् च उक् च तश्च तेषां समाहारद्वन्द्व इसुसुक्ताः, ते
अन्ता यस्य स इसुसुक्तान्तः, तस्मात्। इसुसुक्तान्तात् पञ्चम्यन्तं, कः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्।
अङ्गस्य का अधिकार है। उस्येकः से उस्य की अनुवृत्ति आती है।
इस्, उस्, उक् और त अन्त में हो ऐसे अंग से परे उ के स्थान पर क
आदेश होता है।
साक्तुकम्। सनुओं का समूह। सक्तूनां समूहः। सक्तु आम् में अचित्त-अप्राणी
का वाचक सक्तु शब्द है। अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् से उक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके
इसुसुक्तान्तात्कः से उ के स्थान पर क आदेश करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके
सक्तु+क बना। उक् के कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करके साक्तुक बना।
स्वादिकार्य से साक्तुकम् सिद्ध हुआ।
हास्तिकम्। हाथियों का समूह। हस्तिनां समूहः। हस्तिन् आम् में
अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् से उक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके इसुसुक्तान्तात्कः की प्रवृत्ति नं
होने से उस्येकः से इक आदेश और किति च से आदिवृद्धि करके हास्तिन्+इक बना।
नस्तद्धिते से टि का लोप करके हास्त्+इक बना। वर्णसम्मेलन करके स्वादिकार्य करने पर
हास्तिकम् सिद्ध हुआ।
धैनुकम्। गायों का समूह। धेनूनां समूहः। धेनु आम् में अचित्तहस्तिधेनोष्ठक्
से उक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, इसुसुक्तान्तात्कः से उ के स्थान पर क आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा,
सुप् का लुक् करके धेनु+क बना। उक् के कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि
करके धैनुक बना। स्वादिकार्य से धैनुकम् सिद्ध हुआ।