अनपत्यार्थेऽणि परे इन् प्रकृत्या स्यात्। तेन नस्तद्धिते इति टिलोपो न।
युवतीनां समूहो यौवनम्।
१०४९- इनण्यनपत्ये। न अपत्यम् अनपत्यं, तस्मिन्। इन् प्रथमान्तम्, अणि सप्तम्यन्तम्, अनपत्ये सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्रकृत्यैकाच् से प्रकृत्या की अनुवृत्ति आती है। अपत्यार्थ से भिन्न अर्थ में विहित अण् प्रत्यय के परे रहते इन् को प्रकृतिभाव होता है।
गार्भिणम्। गर्भवती स्त्रियों का समूह। गर्भिणीनां समूहः। गर्भिणी आम् से अनुदात्तादेरञ् से अञ् प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधकर भिक्षादिभ्योऽण् से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके गर्भिणी+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके गार्भिणी+अ बना। यहाँ पर यस्येति च से ईकार का लोप प्राप्त था किन्तु भस्याढे तद्धिते (ढ-भिन्न तद्धित के परे रहते भसंज्ञक अङ्ग को पुंवद्भाव होता है)से पुंवद्भाव हो जाने से स्त्रीत्वबोधन डीष् की निवृत्ति होकर गार्भिण् बना। अब नस्तद्धिते से टि का लोप प्राप्त था किन्तु इनण्यनपत्ये (अपत्यार्थ से भिन्न अर्थ के अण् प्रत्यय के परे रहते इन् को प्रकृतिभाव हो) से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् टि का लोप नहीं हुआ। अब वर्णसम्मेलन होने पर गार्भिण बना। स्वादिकार्य करके गार्भिणम् सिद्ध हुआ।
यौवनम्। युवतियों का समूह। युवतीनां समूहः। युवति आम् से अनुदात्तादेरञ् से अञ् प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधकर भिक्षादिभ्योऽण् से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके युवति+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके यौवति+अ बना। यहाँ पर यस्येति च से ईकार का लोप प्राप्त था किन्तु भस्याढे तद्धिते से पुंवद्भाव हो जाने से स्त्रीत्वबोधन डीष् की निवृत्ति होकर युवन् बना। आदिवृद्धि होकर अब नस्तद्धिते से टि का लोप प्राप्त था किन्तु अन् सूत्र से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् टि का लोप नहीं हुआ। अब वर्णसम्मेलन होने पर यौवन बना। स्वादिकार्य करके यौवनम् सिद्ध हुआ।