एते निपात्यन्ते। पितुर्भ्राता पितृव्यः। मातुर्भ्राता मातुलः।
मातुः पिता मातामहः। पितुः पिता पितामहः।
.....
१०४६- पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः। पितृव्यश्च मातुलश्च मातामहश्च पितामहश्च तेषामिरतेतरयोगद्वन्द्वः। पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्।
पिता के भ्राता अर्थात् चाचा अर्थ में पितृव्य, माता के भ्राता अर्थात् मामा अर्थ में मातुल, माता के पिता अर्थात् नाना अर्थ में मातामह और पिता के पिता अर्थात् दादा अर्थ में पितामह का निपातन किया जाता है।
बने बनाये शब्दों को प्रकृति और प्रत्यय दिखाये विना सूत्रों में पढ़ देना निपातन कहलाता है। सूत्रकार पाणिनि जी ने इन चार शब्दों की प्रक्रिया न दिखाकर सीधे सूत्र में ही पढ़ दिया। अब हम स्वयं इनमें प्रकृति, प्रत्यय, समर्थ विभक्ति और अनुबन्ध आदि की कल्पना कर सकते हैं। जैसे-
पितृव्यः। पितुर्भ्राता- पिता के भाई अर्थात् चाचा, ताऊ। पितृ शब्द से पिता के भ्राता अर्थ में व्यत् प्रत्यय की कल्पना करके पितृव्य बनता है और सु, रुत्व और विसर्ग करके पितृव्यः बन जायेगा।
मातुलः। मातुर्भ्राता- माता के भाई अर्थात् मामा। मातृ शब्द से भ्राता अर्थ में डुलच् प्रत्यय की कल्पना करके अनुबन्धलोप करने पर उल बचता है। टित् मानकर टेः इस सूत्र से टिसंज्ञक ऋकार का लोप करके मात्+उल=मातुल बनता है और सु, रुत्व और विसर्ग करके मातुलः बन जायेगा।
मातामहः। मातुः पिता-माता के पिता अर्थात् नाना। मातृ शब्द से उनके पिता अर्थ में डामहच् प्रत्यय की कल्पना करके अनुबन्धलोप करने पर आमह बचता है। डित् मान कर
टेः इस सूत्र से टिसंज्ञक ऋकार का लोप करके मात्+आमह=मातामह बनता है और सु, रुत्व-विसर्ग करके मातामहः बन जायेगा।
पितामहः। पितुः पिता- पिता के पिता अर्थात् दादा। पितृ शब्द से पिता अर्थ में डामहच् प्रत्यय की कल्पना करके अनुबन्धलोप करने पर आमह बचता है। डित् मान कर टेः इस सूत्र से टिसंज्ञक ऋकार का लोप करके पित्+आमह=पितामह बनकर सु, रुत्व-विसर्ग करके पितामहः बन जायेगा।
इन शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में डीष् करके मातुली, मातामही, पितामही और टाप् करके पितृव्या आदि रूप बनते हैं।