अकृद्यकारेऽसार्वधातुके यकारे च्चौ च परे ऋदन्ताङ्गस्य रीडादेशः।
यस्येति च। पित्र्यम्। उषस्यम्।
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१०४५- रीड् ऋतः। रीड् प्रथमान्तं, ऋतः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से अकृत्सार्वधातुकयोः एवं अयड् यि विडन्ति से यि एवं च्चौ च से च्चौ की अनुवृत्ति आती है और अङ्गस्य का अधिकार है।
कृत् से भिन्न का यकार, असार्वधातुक यकार अथवा च्चि प्रत्यय के परे होने पर ऋदन्त अङ्ग के स्थान पर रीड् आदेश होता है।
रीड् में डकार की इत्संज्ञा होती है, री मात्र बचता है। डित् होने के कारण डिच्च की सहायता से अन्त्य वर्ण ऋकार के स्थान पर ही होता है।
पित्र्यम्। पितर देवता हैं इस हवि पदार्थ के। पितरो देवता अस्य लौकिक विग्रह और पितृ जस् अलौकिक विग्रह में सास्य देवता के अर्थ में वाय्वृतुपित्रुषसो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पितृ+य बना। रीड् ऋतः से डिच्च की सहायता से अन्त्य अल् ऋकार के स्थान पर अनुबन्धविनिर्मुक्त री आदेश हो गया। पितरी+य बना। ईकार का यस्येति च से लोप हुआ तो पितर्+य बना। वर्णसम्मेलन, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, पित्र्यम् सिद्ध हुआ।
उषस्यम्। उषा देवता हैं इस हवि पदार्थ के। उषा देवता अस्य लौकिक विग्रह और उषस् सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता से प्राप्त अण् को बाधकर वाय्वृतुपित्रुषसो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके उषस्+य बना। वर्णसम्मेलन, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, उषस्यम् सिद्ध हुआ।