वायव्यम्। ऋतव्यम्।
१०४४- वाय्वृतुपित्रुषसो यत्। वायुश्च ऋतुश्च पिता च उषस् च तेषां समाहारद्वन्द्वो वाय्वृतुपित्रुषस्, तस्मात्। वाय्वृतुपित्रुषसः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। सास्य देवता यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होकर आता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याण्य्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।
वायु, ऋतु, पितृ और उषस् इन प्रथमान्त समर्थ प्रातिपदिकों से 'वह इसका देवता है' इस अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।
वायव्यम्। वायु देवता हैं इस हवि पदार्थ के। वायुर्देवता अस्य लौकिक विग्रह और वायु सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता के अर्थ में वाय्वृतुपित्रुषसो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके वायु+य बना। ओर्गुणः से उकार को गुण करके वायो+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर वायव्य बना। सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, वायव्यम् सिद्ध हुआ।
ऋतव्यम्। ऋतु देवता हैं इस हवि पदार्थ के। ऋतुर्देवता अस्य लौकिक विग्रह और ऋतु सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता से प्राप्त अण् को बाधकर वाय्वृतुपित्रुषसो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ऋतु+य बना। ओर्गुणः से उकार को गुण करके ऋतो+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर ऋतव्य बना। सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, ऋतव्यम् सिद्ध हुआ।