सौम्यम्।
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१०४३- सोमाट् ट्यण्। सोमात् पञ्चम्यन्तं, ट्यण् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। सास्य देवता यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होकर आता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।
प्रथमान्त समर्थ प्रातिपदिक सोम से 'वह इसका देवता है' इस अर्थ में क्षण प्रत्यय होता है।
चुटू से टकार और हलन्त्यम् से णकार इत्संज्ञक हैं, य बचता है। टित्करण का प्रयोजन स्त्रीत्वविवक्षा में टिड्ढाण० से डीष् करना है। णित् का प्रयोजन आदिवृद्धि है।
सौम्यम्। सोम देवता हैं इस पदार्थ के। सोमो देवता अस्य लौकिक विग्रह और सोम सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता से प्राप्त अण् को बाधकर के सोमाट् क्षण से क्षण प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सोम+य बना। आदिवृद्धि, यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप करके सौम्य बना। सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, सौम्यम् सिद्ध हुआ।