Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 46
Show
VṛttiGovind
LSK 1042
घन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
शुक्राद्घन्
Aṣṭādhyāyī 4.2.26
Vṛtti Varadarājācārya

शुक्रियम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०४२- शुक्राद् घन्। शुक्रात् पञ्चम्यन्तं, घन् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। सास्य देवता यह पूरा सूत्र अनुवर्तन होकर आता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।

प्रथमान्त समर्थ प्रातिपदिक शुक्र से 'वह इसका देवता है' इस अर्थ में घन् प्रत्यय होता है।

यह सास्य देवता का अपवाद है। घन् में नकार इत्संज्ञक है और केवल घ् के स्थान पर आयने० से इय् आदेश होकर इय बन जाता है।

शुक्रियम्। शुक्र देवता हैं इस पदार्थ के। शुक्रो देवता अस्य लौकिक विग्रह और शुक्र सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता के अर्थ में शुक्राद् घन् से घन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, आयनेयीनीयियः फढखछ्यां प्रत्ययादीनाम् से केवल घ् के स्थान पर इय् आदेश करके शुक्र+इय बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् के लुक् होने पर आदिवृद्धि तो प्राप्त नहीं है किन्तु यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप करके शुक्र+इय बना। वर्णसम्मेलन करके शुक्रिय बना। सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, शुक्रियम् सिद्ध हुआ।