इन्द्रो देवताऽस्येति ऐन्द्रं हविः। पाशुपतम्। बार्हस्पत्यम्।
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१०४१- साऽस्य देवता। सा प्रथमान्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्यन्तम्, अस्य षष्ठ्यन्तं, देवता प्रथमान्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।
देवतावाचक प्रथमान्त समर्थ प्रातिपदिक से 'वह इसका देवता है' इस अर्थ में अण् प्रत्यय होता है।
ऐन्द्रं हविः। इन्द्र देवता हैं इस हवनीय पदार्थ के। इन्द्रो देवता अस्य लौकिक विग्रह और इन्द्र सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता से अण्, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके ऐकार आदेश और भसंज्ञक अकार का लोप करने पर ऐन्द्र+अ, वर्णसम्मेलन करके ऐन्द्र, हविः इस नपुंसक शब्द के विशेषण होने से सु होकर उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप करके ऐन्द्रम् यह नपुंसक शब्द सिद्ध हुआ।
पाशुपतम्। पशुपति देवता हैं इस हवनीय पदार्थ के। पशुपतिदेवता अस्य
लौकिक विग्रह और पशुपति सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता से के अर्थ में पति उत्तरपद वाला होने के कारण दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय प्राप्त था किन्तु पशुपति शब्द के अश्वपत्यादि गण में होने के कारण अश्वपत्यादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके भसंज्ञक इकार का लोप, पाशुपत्+अ, वर्णसम्मेलन, पाशुपत, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, पाशुपतम् सिद्ध हुआ।
बार्हस्पत्यम्। बृहस्पति देवता हैं इस पदार्थ के। बृहस्पतिर्देवता अस्य लौकिक विग्रह और बृहस्पति सु अलौकिक विग्रह में सास्य देवता के अर्थ में पति उत्तरपद वाला होने के कारण दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः से ण्य प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके बार्हस्पति+य बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर भसंज्ञक इकार का लोप होने पर बार्हस्पत्+य, वर्णसम्मेलन, बार्हस्पत्य बना। सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप, बार्हस्पत्यम् सिद्ध हुआ।