शरावे उद्धृतः शराव ओदनः।
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१०३९- तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः। तत्र सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्यन्तं, उद्धृतम् प्रथमान्तम्, अमत्रेभ्यः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है। मूल में सूत्र की वृत्ति नहीं लिखी गई है फिर भी इसकी वृत्ति इस तरह हो सकती है- पात्रविशेषवाचिभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यः समर्थ-प्रातिपदिकेभ्यस्तत्र उद्धृतम् इत्यर्थे अण् प्रत्ययो भवति।
‘उसमें निकाल कर रखा हुआ’ इस अर्थ में सप्तम्यन्त समर्थ पात्रविशेष के वाचक प्रातिपदिको से तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय होता है।
अमत्र पात्रविशेष को कहते हैं। तत्र यह पद सप्तम्यन्त के लिए निर्देश है। अतः सप्तम्यन्त प्रातिपदिक से ही प्रत्यय होगा।
शाराव ओदनः। शराव में निकाल कर रखा गया भात। शरावे उद्धृतः। शराव डि में तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर शाराव बना। इससे स्वादि कार्य करके शारावः बनता है किन्तु आगे ओदनः परे है, अतः सु को रुत्व, उसको भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि से यत्व, हलि सर्वेषाम् से यकार का लोप होकर शाराव ओदनः सिद्ध हुआ।