Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 46
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VṛttiGovind
LSK 1038
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
परिवृतो रथः
Aṣṭādhyāyī 4.2.10
Vṛtti Varadarājācārya

अस्मिन्नर्थेऽण् प्रत्ययो भवति। वस्त्रेण परिवृतो वास्त्रो रथः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०३८- परिवृतो रथः। परिवृतः प्रथमान्तं, रथः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तेन रक्तं रागात् से तेन और प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।

‘उससे परिवृत अर्थात् लिपटा हुआ, घिरा हुआ रथ’ इस अर्थ में तृतीयान्त समर्थ प्रातिपदिक से तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय होता है।

जो परिवृत हो वह रथ ही हो, अन्य नहीं। इसीलिए सूत्र में रथः भी पढ़ा गया है।

वास्त्रो रथः। वस्त्र से लिपटा हुआ रथ। वस्त्रेण परिवृतः। वस्त्र टा में परिवृतो रथः से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर वास्त्र बना। इससे स्वादि कार्य करके वास्त्रः बनता है किन्तु आगे रथः परे है, अतः सु को रुत्व, उत्व, गुण होकर वास्त्रो रथः सिद्ध हुआ। इसी तरह कम्बलेन परिवृतः काम्बलो रथः, रजसा परिवृतो राजसो रथः आदि भी बनाये जा सकते हैं।