Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 46
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VṛttiGovind
LSK 1037
ड्य-ड्यण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ
Aṣṭādhyāyī 4.2.9
Vṛtti Varadarājācārya

वामदेवेन दृष्टं साम वामदेव्यम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०३७- वामदेवाड्ड्यड्यौ। ड्यच्च ड्यश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो ड्यड्ड्यौ। वामदेवात् पञ्चम्यन्तं, ड्यड्ड्यौ प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तेन रक्तं रागात् से तेन और दृष्टं साम इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार आ रहा है।

‘देखा गया साम’ इस अर्थ में तृतीयान्त समर्थ वामदेव इस प्रातिपदिक से तद्धितसंज्ञक ड्यत् और ड्य प्रत्यय होते हैं।

डकार की चुटू से इत्संज्ञा होती है और तकार हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है, य शेष रहता है। डित्करण का प्रयोजन स्वरविधान के लिए है। तित्करण का भी फल स्वरों का विधान ही है। दो प्रत्ययों में एक तित् है और एक तित् नहीं है। रूपों में कोई अन्तर नहीं आयेगा। यह सूत्र दृष्टं साम का अपवाद है।

वामदेव्यम्। वामदेव के द्वारा देखे गये साम के मन्त्र। वामदेवेन दृष्टम् लौकिक

विग्रह और वामदेव टा अलौकिक विग्रह में दृष्टं साम से अण् प्राप्त था, उसे बाधकर के वामदेवाड्यड्ययौ से ड्यत् या ड्य प्रत्यय हुआ। ड्यत् के पक्ष में डकार और तकार का अनुबन्धलोप हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप करने पर वामदेव्+य, वर्णसम्मेलन करके वामदेव्य, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप करके वामदेव्यम् सिद्ध हुआ। विशेष्य साम-शब्द के नपुंसक होने के कारण यह भी नपुंसक हो गया।