तेनेत्येव। वसिष्ठेन दृष्टं वासिष्ठं साम।
१०३६- दृष्टं साम। दृष्टं प्रथमान्तं, साम प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तेन रक्तं रागात् से तेन और प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार पूर्ववत् है ही।
‘देखा गया साम’ अर्थात् ज्ञान रूप में प्राप्त किया गया साम’ इस अर्थ में तृतीयान्त समर्थ प्रातिपदिक से अण् प्रत्यय होता है।
वैदिकमन्त्रों का अध्ययन, साक्षात्कार, सिद्धि जिन ऋषियों की थी, मन्त्र के विनियोग में उनका नाम लिया जाता है। तेन दृष्टं साम अर्थात् उस ऋषिविशेष के द्वारा प्राप्त सामदेव की ऋचाएँ इस अर्थ में प्रत्यय का विधान किया गया।
वासिष्ठं साम। वसिष्ठ के द्वारा देखे गये अर्थात् जाने हुए साम के मन्त्र। वसिष्ठेन दृष्टम् लौकिक विग्रह और वसिष्ठ टा अलौकिक विग्रह में दृष्टं साम से अण्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार के लोप करने पर वासिष्ठ+अ, वर्णसम्मेलन करके वासिष्ठ, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप करके वासिष्ठम् सिद्ध हुआ। विशेष्य शब्द साम के नपुंसक होने के कारण यह भी नपुंसक हो गया।