पूर्वेण विहितस्य लुप् स्यात्, षष्टिदण्डात्मकस्य कालस्यावान्तरविशेषश्चेत्र
गम्यते। अद्य पुष्यः।
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१०३५- लुबविशेषे। न विशेषः अविशेषस्तस्मिन्। लुप् प्रथमान्तम्, अविशेषे सप्तम्यन्तं,
द्विपदं सूत्रम्। प्राग्दीव्यतोऽण् से विभक्तिविपरिणाम करके अणः की अनुवृत्ति आती है।
'नक्षत्रेण युक्तः कालः' से विहित अण् प्रत्यय का लुप् हो जाता है, यदि
साठ घटी वाले काल अर्थात् अहोरात्र का अवान्तरभेद अर्थ गम्यमान न हो रहा हो तो।
एक अहोरात्र अर्थात् दिनरात में साठ घटियाँ होती हैं। आज के व्यावहारिक
समय के अनुसार एक घण्टे में ढाई घटियाँ होती है अर्थात् साठ घटियों का एक अहोरात्र
होता है। एक अहोरात्र में अवान्तर काल दिन, रात, प्रातः, सायम्, दोपहर आदि माने जाते
हैं। यदि अहोरात्र का अवान्तर भेद गम्यमान न हो रहा हो तो यह सूत्र प्रवृत्त होता है। जैसे
कि आज कहने से अहोरात्र का अवान्तर भेद का पता नहीं चलता। हाँ, यदि आज दिन में
या आज रात को अथवा आज दोपहर को आदि होता तो अहोरात्र के अवान्तर कालभेद की
प्रतीति होती है। लुप् भी एक लोप जैसा ही है जैसे कि लुक्। इस सम्बन्ध में प्रत्ययस्य
लुक्श्लुलुपः का स्मरण करें।
अद्य पुष्यः। आज पुष्य नक्षत्र है अर्थात् आज चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में भ्रमण कर रहे हैं। पुष्येण युक्तः कालोऽद्य। पुष्य टा से नक्षत्रेण युक्तः कालः से अण् प्रत्यय हुआ। उसका लुबविशेषे से लुप् हुआ। अतः आदिवृद्धि आदि कुछ भी नहीं हुआ जिससे पुष्य से पुष्य ही बना रह गया। स्वादिकार्य करके पुष्यः बनता है। इसका अर्थ हुआ- पुष्य नक्षत्र से युक्त समय(आज)।