Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 46
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VṛttiGovind
LSK 1034
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
नक्षत्रेण युक्तः कालः
Aṣṭādhyāyī 4.2.3
Vṛtti Varadarājācārya

अण् स्यात्।

वार्तिकम्- तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम्। पुष्येण युक्तं पौषमहः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब रक्ताद्यर्थक प्रकरण का आरम्भ होता है। रक्त आदि अर्थों में प्रत्ययों का विधान होता है, इस लिए इस प्रकरण को रक्ताद्यर्थक प्रकरण कहा गया।

१०३४- रक्षत्रेण युक्तः कालः। नक्षत्रेण तृतीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्यन्तं, युक्तः प्रथमान्तं, कालः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तेन रक्तं रागात् से तेन और प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की

अनुवृत्ति आती है। और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा

का अधिकार पूर्ववत् है ही।

नक्षत्रवाचक तृतीयान्त प्रातिपदिक से 'उससे युक्त' अर्थ में तद्धितसंज्ञक

अण् प्रत्यय होता है, यदि वह युक्त काल अर्थात् समय हो तो।

चैत्रमहः। चित्रा नक्षत्र से युक्त दिन अर्थात् चित्रा नक्षत्र में जिस दिन चन्द्रमा

भ्रमण कर रहे हैं, वह दिन। दिन-शब्द काल अर्थात् समय का वाचक है। चित्रया युक्तमहः

लौकिक विग्रह और चित्रा सु अलौकिक विग्रह है। ऐसी स्थिति में नक्षत्रेण युक्तः कालः

से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि, भसंज्ञक आकार का

लोप करके चैत्र बना। विशेषपद अहः नपुंसकलिङ्ग का है, अतः इसमें नपुंसकलिङ्ग ही

हुआ। स्वादि कार्य करके चैत्रम् बना। कौमुदी में यह प्रयोग नहीं है फिर भी सूत्र के

उदाहरण के लिए व्याख्या में प्रदर्शित किया गया।

तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम्। यह वार्तिक है। नक्षत्रसम्बन्धी

अर्थात् नक्षत्र से युक्त काल अर्थ में नक्षत्रवाचक शब्द से विहित अण् प्रत्यय के परे

रहते तिष्य और पुष्य शब्दों के यकार का लोप होता है।

पौषमहः। पुष्य नक्षत्र से युक्त दिन अर्थात् ऐसा दिन जिसमें चन्द्रमा पुष्यनक्षत्र में

चल रहे हों। पुष्येण युक्तः कालः विग्रह है। पुष्य टा से नक्षत्रेण युक्तः कालः सूत्र के

द्वारा अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके यस्येति च

से अकार के लोप होने के बाद पौष्य+अ बना है। तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति

वाच्यम् से यकार के भी लोप होने पर वर्णसम्मेलन होकर पौष बना। विशेष अहः के

अनुसार नपुंसकलिङ्ग में स्वादिकार्य करके पौषम् बन जाता है। पौषमहः।