Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 46
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VṛttiGovind
LSK 1033
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तेन रक्तं रागात्
Aṣṭādhyāyī 4.2.1
Vṛtti Varadarājācārya

अण् स्यात्। ज्यतेऽनेनेति रागः। कषायेण रक्तं वस्त्रं काषायम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०३३- तेन रक्तं रागात्। तेन तृतीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्यन्तं, रक्तं प्रथमान्तं, रागात् पञ्चम्यन्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार पूर्ववत् है ही।

‘उससे रंगा हुआ’ इस अर्थ में तृतीयान्त रंगवाचक शब्द से अण् प्रत्यय होता है।

तेन रक्तं रागात् इस सूत्र से आया हुआ राग शब्द की व्युत्पत्ति करके अर्थ बताया जा रहा है- रज्यतेऽनेनेति रागः। रंगा जाता है इससे, वह अर्थात् रंगने का जो साधन नील, पीत आदि रङ्ग। रञ्ज् धातु से करण अर्थ में अकर्तरि च कारके सञ्ज्ञायाम् से घञ् प्रत्यय होने पर घञि च भावकरणयोः से नलोप होने पर चजोः कु घिण्णयतोः से जकार को कुत्व करके गकार होने पर उपधावृद्धि करके रागः यह कृदन्त रूप सिद्ध होता है।

काषायम्। गेरुए रंग से रंगा हुआ वस्त्र आदि। कषायेण रक्तम् लौकिक विग्रह और कषाय टा अलौकिक विग्रह में तेन रक्तं रागात् से अण्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप करने पर काषाय्+अ, वर्णसम्मेलन करके काषाय, सु, नपुंसक में अम् आदेश और पूर्वरूप करके काषायम् सिद्ध हुआ। विशेष्य वस्त्रम् के नपुंसक होने के कारण यह भी नपुंसक हो गया।