Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1032
तद्राजस्य लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
कम्बोजाल्लुक्
Aṣṭādhyāyī 4.1.175
Vṛtti Varadarājācārya

अस्मात्तद्राजस्य लुक्! कम्बोजः। कम्बोजौ।

वार्तिकम्- कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यम्। चोलः। शकः। केरलः। यवनः।

इत्यपत्याधिकारः॥४५॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०३२- कम्बोजाल्लुक्। कम्बोजात् प्रथमान्तं, लुक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। ते तद्राजाः से विभक्तिविपरिणाम करके तद्राजस्य की अनुवृत्ति आती है।

कम्बोज शब्द से परे तद्राजसंज्ञक प्रत्यय का लुक् होता है।

तद्धित का मान कर के होने वाले जितने भी कार्य हैं आदिवृद्धि, भसंज्ञक वर्ण का लोप आदि, उसके लुक् हो जाने से नहीं होंगे।

कम्बोजः। कम्बोजौ। कम्बोज की सन्तान अथवा कम्बोज का राजा। कम्बोज शब्द भी जनपदवाची और क्षत्रियविशेषवाची है। कम्बोजस्यापत्यं राजा वा लौकिक विग्रह और कम्बोज इस् अलौकिक विग्रह है। जनपदशब्दात् क्षत्रियाद् से अञ् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर के आदिवृद्धि प्राप्त थी किन्तु कम्बोजाल्लुक् से तद्राजसंज्ञक अञ् प्रत्यय के लुक् हो जाने के कारण आदिवृद्धि आदि कार्य नहीं हुए। स्वादिकार्य करके कम्बोजः, कम्बोजौ, कम्बोजाः आदि सामान्य ही रूप होंगे। कम्बोज शब्द के तद्धितान्त और अतद्धितान्त रूप समान ही होंगे अर्थात् देखने में शब्द एक जैसे लगेंगे किन्तु अर्थ के प्रसंगानुसार तद्धितान्त या अतद्धितान्त है, समझना चाहिए।

कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। वार्तिककार का कहना है कि कम्बोलाल्लुक् यह सूत्र न्यून है। इसके स्थान पर कम्बोजादिभ्यो लुक् ऐसा कहना चाहिए। ऐसा करने से केवल कम्बोज शब्द से ही नहीं अपितु कम्बोजादि आकृतिगण मान कर के अनेक शब्दों से तद्राजसंज्ञक प्रत्ययों का लुक् किया जा सकेगा। जिससे चोलः, यवनः आदि शब्दों में भी तद्राजसंज्ञक प्रत्ययों का लुक् हो सकेगा। चोलस्यापत्यम् चोलदेश की सन्तान आदि अर्थ में प्राप्त अण् आदि प्रत्ययों के लुक् हो जाने से चोल से चोल ही बनता है अर्थात् आदिवृद्धि आदि कार्य नहीं होते। अन्यथा चौलः बनने लगता। इस वार्तिक से अण् आदि का लुक् करके रूप बनते हैं-

चोलस्यापत्यं- चोलः, चोलौ, चोलाः। शकस्यापत्यं- शकः, शकौ, शकाः।

केरलस्यापत्यं- केरलः, केरलौ, केरलाः। यवनस्यापत्यं- यवनः, यवनौ, यवनाः आदि।

उक्त स्थलों पर चोल, शक, केरल और यवन शब्द जनपदक्षत्रियवाची हैं।

पञ्चाल आदि ऊपर बताये गये सभी शब्द जनपद और उस जनपद के राजा दोनों को कहते हैं। अतः इन सभी शब्दों से जब उस देश का राजा ऐसा विग्रह होगा तो भी क्षत्रियसमानशब्दाज्जनपदात्तस्य राजन्यपत्यवत् वार्तिक से अपत्यार्थ के समान अण् आदि प्रत्यय आदि और चोल, कम्बोज आदि में लुक् होकर पञ्चालः, चोलः, कम्बोजः, आदि ही रूप बनते हैं। अतः पाञ्चालः से पाञ्चाल राजा के पुत्र अथवा पञ्चाल देश का राजा आदि अर्थ को प्रसंग से समझना चाहिए।

परीक्षा

१- साधारण तद्धित और अपत्यार्थक तद्धित में अन्तर बताइये।

१०

२- आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् की व्याख्या कीजिए।

१०

३- अपत्याधिकार-प्रकरण में होने वाले प्रत्ययों पर प्रकाश डालिए।

१०

४- अण्, यञ्, इञ् और ढक् प्रत्ययों के दो-दो उदाहरणों की प्रक्रिया दिखाइये।

१०

५- स्त्रीभ्यो ढक् और शिवादिभ्योऽण् में बाध्यबाधकभाव स्पष्ट कीजिये।

१०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

अपत्याधिकार पूर्ण हुआ।

अथ रक्ताद्यर्थकाः