Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1031
तद्राजस्य लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम्
Aṣṭādhyāyī 2.4.62
Vṛtti Varadarājācārya

बहुष्वर्थेषु तद्राजस्य लुक् तदर्थकृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम्।

इक्ष्वाकवः। पञ्चालाः इत्यादि।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०३१- तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम्। तद्राजस्य षष्ठ्यन्तं, बहुषु सप्तम्यन्तं, तेन तृतीयान्तम्, एव अव्ययम्, अस्त्रियां सप्तम्यन्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। ण्यक्षत्रियार्षजितो लुगणिजोः से लुक् की अनुवृत्ति आती है।

बहुवचन में तद्राजसंज्ञक प्रत्यय का लुक् होता है, यदि बहुत्व तद्राज प्रत्यय के अर्थद्वारा किया गया हो तो किन्तु स्त्रीलिङ्ग में लुक् नहीं होता।

इक्ष्वाकवः। इक्ष्वाकुओं की सन्तानें। इक्ष्वाकु शब्द जनपद और क्षत्रिय दोनों का वाचक है। इक्ष्वाकोरपत्यम् लौकिक विग्रह और इक्ष्वाकु डस् अलौकिक विग्रह है। जनपदशब्दात् क्षत्रियादज् से अज् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके ऐक्ष्वाकु+अ बना। यहाँ पर ओर्गुणः से गुण होना था किन्तु दाण्डिनायन-हास्तिनायनाथर्वणिक० से टिलोप निपातन होने से ऐक्ष्वाक और सु, रुत्व, विसर्ग करके ऐक्ष्वाकः बनता है। इससे जब बहुवचन जस् आता है तो तद्रासंज्ञक अज् प्रत्यय का तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् से लुक् हो जाता है। निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियमानुसार अज् प्रत्यय को निमित्त मान कर की गई आदिवृद्धि और टिलोप का निपातन आदि भी स्वतः निवृत्त हो जाते हैं जिससे मूल शब्द ही इक्ष्वाकु के रूप में आ जाता है। इससे बहुवचन में 'भानु शब्द की तरह इक्ष्वाकवः ही रूप बनता है। रूपों को देखें- ऐक्ष्वाकः, ऐक्ष्वाकौ, इक्ष्वाकवः, ऐक्ष्वाकम्, ऐक्ष्वाकौ, इक्ष्वाकून् आदि।

पञ्चालाः। पञ्चालों की सन्तानें। पञ्चाल शब्द जनपद और क्षत्रिय दोनों का वाचक है। पञ्चालस्यापत्यानि लौकिक विग्रह और पञ्चाल डस् अलौकिक विग्रह है। जनपदशब्दात् क्षत्रियादज् से अज् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि, अकार का लोप करके पाञ्चाल। इससे जब बहुवचन जस् आता है तो तद्रासंज्ञक अज् प्रत्यय का तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् से लुक् हो जाता है। निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियमानुसार अज् प्रत्यय को निमित्त मान कर की गई आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप आदि स्वतः निवृत्त हो जाते हैं जिससे मूल शब्द ही पञ्चाल के रूप में आ जाता है। इससे बहुवचन में वृद्धि आदि रहित पञ्चालाः ही रूप बनता है। इसके एकवचन का रूप जनपदशब्दात्क्षत्रियादज् सूत्र में बना चुके हैं। इसके रूपों को देखें- पाञ्चालः, पाञ्चालौ, पञ्चालाः, पाञ्चालम्, पाञ्चालौ, पञ्चालान् आदि।