अजादयस्तद्राजसंज्ञाः स्युः।
१०३०- ते तद्राजाः। ते प्रथमान्तं, तद्राजाः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्।
पूर्वोक्त अञ् आदि प्रत्यय तद्राजसंज्ञक होते हैं।
इस सूत्र में पठित ते शब्द का अर्थ है- पूर्वसूत्र जनपदाशब्दात् क्षत्रियादञ् से विहित अञ् आदि प्रत्यय। उस प्रकरण में अञ्, अण्, ड्यण्, ण्य ये प्रत्यय आते हैं। इन सब की तद्राज संज्ञा की जाती है और इसका फल तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् की प्रवृत्ति है। पुनश्च- इन प्रत्ययों की तद्राजसंज्ञा इस लिए होती है क्योंकि ये प्रत्यय उन उन जनपदों के राजा के भी बोधक हैं।