Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1029
ण्य-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कुरुनादिभ्यो ण्यः
Aṣṭādhyāyī 4.1.172
Vṛtti Varadarājācārya

कौरव्यः। नैषध्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२९- कुरुनादिभ्यो ण्यः। न आदिर्येषां ते नादयः। कुरुश्च नादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः कुरुनादयस्तेभ्यः। कुरुनादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, ण्यः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। जनपदाशब्दात् क्षत्रियादञ् से वचनविपरिणाम के द्वारा जनपदेभ्यः, क्षत्रियेभ्यः एवं तस्यापत्यम् इस सूत्र की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल रहा है।

कुरुशब्द या नकारादिशब्द जब जनपद और क्षत्रिय दोनों के वाचक हों तो उनसे अपत्य अर्थ में तद्धितसंज्ञक ण्य प्रत्यय होता है।

चुटू से णकार की इत्संज्ञा करके य शेष रहता है। कुरु से द्व्यञ्मगध-लिङ्गसूरमसादण् से अण् और नकारादिशब्दों से जनपदाशब्दात् क्षत्रियादञ् से अञ् प्राप्त था। उनका यह अपवाद है।

कौरव्यः। कुरु की सन्तान। कुरु शब्द जनपदविशेष और क्षत्रियविशेष दोनों का वाचक है। कुरोरपत्यं पुमान्। कुरु ङस् में कुरुनादिभ्यो ण्यः से ण्य प्रत्यय, अनुबन्धलोप, आदिवृद्धि, ओर्गुणः से रकारोत्तरवर्ती उकार को गुण करके कौरो+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होने पर कौरव्य बनता है। स्वादिकार्य करके कौरव्यः सिद्ध होता है।

नैषध्यः। निषध की सन्तान। निषध शब्द भी जनपदविशेष और क्षत्रियविशेष दोनों का वाचक है। निषधस्यापत्यं पुमान्। निषध ङस् में नकारादि होने के कारण कुरुनादिभ्यो ण्यः से ण्य प्रत्यय, अनुबन्धलोप, आदिवृद्धि करके यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप करके नैषध्य बनता है। स्वादिकार्य करके नैषध्यः सिद्ध होता है।