Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1028
अञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ्
Aṣṭādhyāyī 4.1.168
Vṛtti Varadarājācārya

जनपदक्षत्रियवाचकाच्छब्दादञ् स्यादपत्ये। पाञ्चालः।

वार्तिकम्- क्षत्रियसमानशब्दाज्जनपदात्तस्य राजन्यपत्यवत्।

पञ्चालानां राजा पाञ्चालः।

वार्तिकम्- पूरोरण् वक्तव्यः। पौरवः।

वार्तिकम्- पाण्डोर्ड्यण्। पाण्ड्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२८- जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ्। जनपदवाचकः शब्दो जनपदशब्दः (मध्यमपदलोपिसमास), तस्मात्। जनपदशब्दात् पञ्चम्यन्तं, क्षत्रियात् पञ्चम्यन्तम्, अञ् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, उद्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल रहा है।

जनपदविशेष का वाचक शब्द यदि उस नाम वाले क्षत्रियविशेष का भी वाचक हो तो उससे अपत्य अर्थ में तद्धितसंज्ञक अञ् प्रत्यय होता है।

जनपद का अर्थ है देश, प्रदेश, देश का एकभाग, जिला आदि। अञ् में जकरा इत्संज्ञक है। जित् का फल वृद्धि है।

पाञ्चालः। पञ्चाल राजा की सन्तान। पञ्चाल शब्द एक देश या प्रदेश का भी वाचक है और राजा का भी अर्थात् पञ्चाल नामक राजा और पञ्चाल नामक देश। पञ्चालस्यापत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। पञ्चाल डस् से औत्सर्गिक अण् को बाधकर के जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् से अञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके पाञ्चाल बना। स्वादिकार्य करके पाञ्चालः सिद्ध हुआ।

क्षत्रियसमानशब्दाज्जनपदात्तस्य राजन्यपत्यवत्। यह वार्तिक है। क्षत्रियवाचक शब्द के समान जो जनपदवाचक शब्द, उससे अपत्यार्थ के समान ही 'उस देश का राजा' इस अर्थ में तद्धित प्रत्यय होते हैं।

देश का राजा इस अर्थ में अपत्यार्थ की तरह प्रत्यय का विधान इससे होता है। जिस तरह से पञ्चालस्यापत्यम् में पाञ्चालः बना उसी तरह पञ्चालानां राजा इस अर्थ में इस वार्तिक से ही अञ् प्रत्यय होकर पूर्ववत् पाञ्चालः ही बनता है। देश वाची शब्द नित्य बहुवचनान्त माना गया है। अतः पञ्चालस्य (देशस्य) राजा विग्रह न करके पञ्चालानां राजा ऐसा विग्रह किया जाता है।

पूरोरण् वक्तव्यः। यह वार्तिक है। पुरु शब्द से अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय हो ऐसा कहना चाहिए।

पौरवः। पूरु की सन्तान। पूरोरपत्यं पुमान् में पूरु डस् से पूरोरण् वक्तव्यः से अण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके आदिवृद्धि हो जाने पर पौरु+अ बना। ओर्गुणः से अन्त्य उकार को गुण होकर पौरो+अ बना। अवादेश, वर्णसम्मेलन, स्वादिकार्य करके पौरवः सिद्ध हुआ।

पाण्डोर्ड्यण्। यह वार्तिक है। पाण्डु शब्द से अपत्य अर्थ में ड्यण् प्रत्यय होता है। डकार की चुटू से इत्संज्ञा होती है तो अन्त्य णकार हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है ही। डित् का प्रयोजन टेः से टि का लोप है।

पाण्ड्यः। पाण्डु की सन्तान। पाण्डोरपत्यं पुमान्। पाण्डु ङस् में पाण्डोर्द्वया से ड्यण् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, आदिवृद्धि, डित् परे होने कारण टेः से टिसंज्ञक टकार का लोप करके पाण्ड्य बनता है। स्वादिकार्य करके पाण्ड्यः सिद्ध होता है।