अङ्गात् परस्य ठस्येकादेशः स्यात्। रैवतिकः।
१०२७- ठस्येकः। ठस्य षष्ठ्यन्तम्, इकः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है।
अङ्ग से परे ठ् के स्थान पर इक आदेश होता है।
इक यह आदेश अदन्त है।
रैवतिकः। रेवती की सन्तान। रेवत्या अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह है। रेवती डन्स् से अपत्यार्थ में तस्यापत्यम् अण् प्राप्त था, उसे बाधकर के रेवत्यादिभ्यष्ठक् से ठक् प्रत्यय होकर उसका अनुबन्धलोप लोप करके ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश
होकर रेवती इक बन गया। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करके रेवती+इक बना। अन्त्य ईकार का यस्येति च से लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर रेवतिक बना। स्वादिकार्य करके रेवतिकः सिद्ध हुआ।