Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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Govind
LSK 1026
ठक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
रेवत्यादिभ्यष्ठक्
Aṣṭādhyāyī 4.1.146
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२६- रेवत्यादिभ्यष्ठक्। रेवती आदिर्येषां ते रेवत्यादयस्तेभ्यः। रेवत्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, ठक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, ड्याण्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल रहा है।

रेवती आदि गण में पठित प्रातिपदिकों से अपत्य अर्थ में तद्धितसंज्ञक ठक् प्रत्यय होता है।

ककार की इत्संज्ञा होती है। कित् होने से किति च की प्रवृत्ति हो सकेगी, जो वृद्धि करता है। ठकारोत्तरवर्ती अकार उच्चारणार्थ है, दूसरे मत में उच्चारणार्थ नहीं है अपितु ठ ऐसा पूरा अदन्त ही है। यह सूत्र भी तस्यापत्यम् का अपवाद है।