Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1025
घ-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
क्षत्राद्घः
Aṣṭādhyāyī 4.1.138
Vṛtti Varadarājācārya

क्षत्रियः। जातावित्येव। क्षात्रिरन्यत्र।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२५- क्षत्राद् घः। क्षत्रात् पञ्चम्यन्तं, घः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्यापत्यम् की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल रहा है।

क्षत्र प्रातिपदिक से अपत्य जाति अर्थ में घ प्रत्यय होता है।

घ में केवल घ् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से इय् आदेश होता है। घ में अ बचा हुआ था। इस तरह इय्+य=इय बन जाता है।

क्षत्रियः। क्षत्र जाति के व्यक्ति की सन्तान। क्षत्रस्यापत्यम् लौकिक विग्रह है। क्षत्र डन्स् से अपत्यार्थ में तस्यापत्यम् के अधिकार में अत इञ् से औत्सर्गिक इञ् प्राप्त था, उसे बाधकर के क्षत्राद् घः से घ प्रत्यय हुआ। उसके स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से इय् आदेश होकर इय बन गया। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके क्षत्र+इय बना। आदिवृद्धि के लिए जित्, णित्, कित् आदि कोई निमित्त नहीं है। अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर क्षत्रिय बना। स्वादिकार्य करके क्षत्रियः सिद्ध हुआ। जाति अर्थ न होने पर इञ् प्रत्यय होकर दाक्षिः, दाशरथिः की तरह क्षात्रिः बनता है।