Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1024
प्रकृतिभावार्थं विधिसूत्रम्
अन्
Aṣṭādhyāyī 6.4.167
Vṛtti Varadarājācārya

अन् प्रकृत्या स्यादणि परे। राजनः। श्वशुर्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२४- अन्। अन् प्रथमान्तम्, एकपदं सूत्रम्। इनण्यनपत्ये से अणि और प्रकृत्यैकाच् से प्रकृत्या की अनुवृत्ति आती है।

अण् प्रत्यय के परे होने पर अन् को प्रकृतिभाव होता है।

यह भी नस्तद्धिते का बाधक है।

राजनः। राजा की सन्तान जो क्षत्रिय जाति की नहीं है। इसके पहले आपने राजन्यः बनाया था, जाति अर्थ में यत् प्रत्यय करके। अब जाति से भिन्न अर्थ में तस्यापत्यम् से औत्सर्गिक अण् प्रत्यय होगा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आदिवृद्धि करके आकार के स्थान पर आकार ही आदेश होता है। इस तरह राजन्+अ बना। यहाँ पर नस्तद्धिते से अन् का लोप प्राप्त था, उसको बाधकर कर के अन् से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् लोप नहीं हुआ। राजन्+अ में वर्णसम्मेलन होकर राजनः सिद्ध हुआ। अपत्यात्मक जाति अर्थ में राजन्यः और जाति से भिन्न अपत्य अर्थ में राजनः।

श्वशुर्यः। ससुर की सन्तान, साला। श्वशुरस्यापत्यम् लौकिक विग्रह है। श्वशुर डस् से तस्यापत्यम् से अण् प्राप्त, उसे बाधकर के राजश्वशुराद्यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्ध लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके श्वशुर+य बना। यस्येति च से रकारोत्तरवर्ती अकार का लोप करके श्वशुर+य बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर श्वशुर्य बना, स्वादिकार्य करके श्वशुर्यः सिद्ध हुआ।