Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 45
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VṛttiGovind
LSK 1023
प्रकृतिभावार्थं विधिसूत्रम्
ये चाभावकर्मणोः
Aṣṭādhyāyī 6.4.168
Vṛtti Varadarājācārya

यादौ तद्धिते परेऽन् प्रकृत्या स्यान्न तु भावकर्मणोः।

राजन्यः। जातावेवेति किम्?

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१०२३- ये चाभावकर्मणोः। भावश्च कर्म च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो भावकर्मणी, न भावकर्मणी अभावकर्मणी। तयोः। ये सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदम्, अभावकर्मणोः सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अन् से अन्, आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति से तद्धिते और प्रकृत्यैकाच् से प्रकृत्या की अनुवृत्ति आती है।

यकारादि तद्धित प्रत्यय के परे रहते अन् को प्रकृतिभाव होता है, यदि तद्धित प्रत्यय भाव और कर्म अर्थ में न हुए हों तो।

यह सूत्र नस्तद्धिते से प्राप्त टिलोप का बाधक है। स्मरण रहे कि प्रकृतिरूपेणावस्थानं प्रकृतिभावः अर्थात् यथावत् बने रहना ही प्रकृतिभाव है। अन् का लोप न होकर यथावत् बना रहे, यही प्रकृतिभाव है।

राजन्यः। राजा की सन्तान आदि। राज्ञोऽपत्यं जातिः लौकिक विग्रह है। राजन्

डस् से तस्यापत्यम् से सामान्य अपत्य अर्थ में अण् प्राप्त, उसे बाधकर के राज्ञो जातावेवेति वाच्यम् के निर्देशन में जाति सहित अपत्य अर्थ में राजश्वशुराद्यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके राजन्+य बना। अब नस्तद्धिते से अन् का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर के ये चाभावकर्मणोः से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् अन् का लोप नहीं हुआ। वर्णसम्मेलन होकर राजन्य बना, स्वादिकार्य करके राजन्यः सिद्ध हुआ। यह क्षत्रिय जाति अर्थ में बना है। अजाति अर्थ में यत् नहीं होगी किन्तु अग्रिम सूत्र से आगे की प्रक्रिया होगी।